PDFSource

भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर PDF in Hindi

भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर Hindi PDF Download

भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर Hindi PDF Download for free using the direct download link given at the bottom of this article.

भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर PDF Details
भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर
PDF Name भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर PDF
No. of Pages 16
PDF Size 0.43 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
Download LinkAvailable ✔
Downloads17
If भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर is a illigal, abusive or copyright material Report a Violation. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर Hindi

दोस्तों,आज हम आपके लिए भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर PDF में भी हिंदी भाषा में लेकर आए हैं। “मातृ वंदना” कविता पीडीएफ महान हिंदी कवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी’ द्वारा रचित देशभक्ति से भरपूर कविता है। निराला जी ने अपनी कविता मातृ वंदना के माध्यम से मातृभूमि भारत के प्रति अपनी भक्ति और भक्ति को प्रदर्शित किया है।

निराला जी अपने जीवन में स्वार्थ और परिश्रम से प्राप्त सभी फलों को भारती माता के चरणों में समर्पित कर देते हैं। इस पोस्ट से आप भारत वंदना कविता अर्थ, उद्देश्य, सारांश और सुविधाओं को पीडीएफ प्रारूप में आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। यहां आपको भारत वंदना कविता प्रश्न और उत्तर पीडीएफ भी पढ़ने को मिलेगा। निराला जी ने इस कविता के माध्यम से प्रत्येक भारतीय को अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित किया है। कवि कहता है कि प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है कि वह अपनी मातृभूमि को मुक्त करे और उसके सम्मान के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दे।

भारत वंदना कविता की विशेषताएं PDF

भारत वंदना की व्याख्या करें तो सुनो भारत वंदना कविता का केंद्रीय भाव निराला जी ने इस कविता के माध्यम से हर भारतवासी को अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित किया है कभी कहते हैं कि अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करना और उसके सामान के लिए अपना सर्वस्व अस्त्र अपन कर देना ही हर देशवासी का कर्तव्य है।

महाकवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी’ द्वारा रचित ‘मातृ वंदना’ कविता देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कविता है। उन्होंने अपनी कविता ‘मातृ वंदना’ के माध्यम से मातृभूमि भारत के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव प्रदर्शित किया है। अपने जीवन में स्वार्थ भाव तथा जीवन भर के परिश्रम से प्राप्त फल को निराला जी ने माँ भारती के चरणों में अर्पित करते हैं।

भारत वंदना कविता के वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मातृ वंदना कविता की व्याख्या 1. ‘मृदुल वसन्त’ जीवन के किस पड़ाव का प्रतीक है
(क) बचपन
(ख) यौवन
(ग) बुढ़ापा,
(घ) उपर्युक्त सभी।

मातृ वंदना कविता का भावार्थ 2. शतदल का शब्दार्थ है
(क) पतझड़
(ख) कुमुदिनी
(ग) कमल
(घ) भंवरा
उत्तर:
1. (ख), 2. (ग)।

भारत वंदना कविता के अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

मातृ वंदना कविता का सारांश प्रश्न 3.
‘अभी न होगा मेरा अंत’ कविता में किस ऋतु के आगमन की बात कही गई है?
उत्तर:
कविता में वसंत ऋतु के आगमन की बात कही गई है।

हिंदी पास बुक 10th क्लास प्रश्न 4.
‘हरे-हरे ये पात’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
उपर्युक्त पंक्ति में अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

Class 10 Hindi Solutions RBSE प्रश्न 5.
कवि का कविता में किस प्रथम चरण की ओर संकेत है?
उत्तर:
कवि का कविता में जीवन के प्रथम चरण ‘किशोरावस्था युवावस्था की ओर संकेत है।

भारत वंदना कविता की व्याख्या प्रश्न 6.
‘फेसँगा निद्रित कलियों पर’ पंक्ति में ‘निद्रित कलियों’ का आशय क्या है?
उत्तर:
कवि ने निद्रित कलियाँ उन आलस्य में डूबे व्यक्तियों को कहा है जिनमें सुगंधरूपी गुण छिपे हैं। कवि उन्हें जागरूक और सक्रिय बनायेगा।

Hindi RBSE Class 10 प्रश्न 7.
‘मातृ-वन्दना’ में कवि ने ‘माँ’ संबोधन किसके लिए किया है?
उत्तर:
कवि ने कविता में ‘माँ’ संबोधन मातृभूमि भारत के लिए किया है।

भारत वंदना कविता के लघूत्तरात्मक प्रश्न

कविता ‘अभी न होगा मेरा अंत’ के अनुसार वसंत आगमन पर प्रकृति में कौन-से परिवर्तन परिलक्षित होते हैं?
उत्तर:
वसंत ऋतु आने पर चारों ओर सुन्दर प्राकृतिक दृश्य दिखाई देने लगते हैं। वृक्षों में हरे-हरे पत्ते लग जाते हैं। डालियों पर कोमल कलियाँ दिखाई देने लगती हैं। प्रात:काल के समय सूर्य की किरणों के कोमल स्पर्श से कलियाँ खिलकर फूल बनने लगती हैं। सूर्य-उदय के मनोहारी दृश्य प्रकट होने लगते हैं।

कक्षा 10 हिंदी के लिए RBSE समाधान प्रश्न 9.
कविता ‘मातृ-वंदना’ के अनुसार कवि माँ के चरणों में क्या-क्या समर्पित करना चाहता है?
उत्तर:
कवि मातृभूमि की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित करना चाहता है। वह अपने परिश्रम से अर्जित सभी वस्तुएँ। माँ के चरणों में अर्पित करना चाहता है। सारी विघ्न-बाधाओं के झेलते हुए और कष्ट सहन करते हुए भी वह सारे जीवन में श्रम के स्वेद से सिंचित पवित्र कमाई माँ पर न्योछावर करना चाहता है। अपना सम्पूर्ण श्रेय (कर्म और यश) वह मातृचरणों की बलिवेदी पर समर्पित कर देना चाहता है।

भारत वंदना कविता के निबन्धात्मक प्रश्न PDF

अभी न होगा मेरा अंत का भावार्थ प्रश्न 10.
‘अभी न होगा मेरा अंत’ कविता का मूल भाव स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
‘अभी न होगा मेरा अंत’ कविता कवि निराला के जीवन-दर्शन पर प्रकाश डालती है। कवि इस रचना द्वारा संदेश देना चाहता है कि मनुष्य को आत्मविश्वास और उत्साह के साथ जीवन बिताना चाहिए। युवावस्था जीवन का सर्वोत्तम सुअवसर होता है। मृत्यु की चिन्ता न करते हुए व्यक्ति को युवावस्था में जीवन का आनन्द लेना चाहिए। अपने आनन्द और उत्साह से समाज के सोए हुए लोगों को लाभान्वित करना चाहिए। कवि अंत की उपेक्षा करते हुए जीवन के आरम्भ को महत्व देना चाहता है। उसे विश्वास है कि उसकी जीवन-लीला शीघ्र समाप्त नहीं होने वाली। उसे सक्रियता से सार्थक जीवन बिताना चाहिए और अन्य लोगों को भी प्रेरित करना चाहिए।

निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) हरे-हरे ये पात……………..अमृत सहर्ष सच पूँगा मैं ।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’ की रचना ‘अभी न होगा मेरा अन्त’ से लिया गया है। यहाँ कवि पूर्ण रूप से आश्वस्त है कि अभी उसकी काव्य-रचना का उत्साह भरा प्रथम चरण प्रारम्भ हुआ है। अभी अंत बहुत दूर है।

(ख) मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण……………अभी न होगा मेरा अंत।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि ‘निराला’ की कविता ‘अभी न होगा मेरा अन्त’ से लिया गया है। कवि हर शिथिल और आलस में पड़े जीवन में जागरूकता और उत्साह भरने का संकल्प कर रहा है।

कवि जीवन परिचय-

फक्कड़पन और निर्भीक अभिव्यक्ति में कबीर का प्रतिनिधित्व करने वाले, कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1896 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर गाँव में हुआ था। आपके पिता पं. रामसहाय त्रिपाठी थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा हाईस्कूल तक हुई। इसके पश्चात् आपने स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत तथा बांग्ला भाषाओं का अध्ययन किया। बाल्यावस्था में ही ‘निराला’ के माता-पिता उन्हें छोड़ स्वर्गवासी हो गए। युवावस्था में एक-एक करके पत्नी, भाई, भाभी तथा चाचा भी महामारी की भेंट चढ़ गए। अंत में उनकी परम प्रिय पुत्री सरोज भी उन्हें छोड़कर परलोक चली गई। मृत्यु के इस ताण्डव से ‘निराला’ टूट गए। उनकी करुण व्यथा ‘सरोज़ स्मृति’ नामक रचना के रूप में बाहर आई। सन् 1961 ई. में हिन्दी के इस निराले साहित्यकार का देहावसान हो गया।

साहित्यिक परिचय-कविवर ‘निराला’ ने हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को अपनी विलक्षण प्रतिभा से अलंकृत किया। उन्होंने काव्य-रचना के अतिरिक्त कहानी, उपन्यास तथा आलोचना पर भी अपनी लेखनी चलाई किन्तु मुख्य रूप से वह एक कवि के रूप में ही प्रसिद्ध रहे। निराला’ की रचनाएँ छायावाद, रहस्यवाद एवं प्रगतिवादी विचारधाराओं से प्रभावित हैं। निरीला जी ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया।

रचनाएँ-अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते, राम की शक्तिपूजा, सरोज-स्मृति तथा लिली, चतुरी चमार, अपरा, अलका, प्रभावती और निरूपमा आदि गद्य रचनाएँ हैं।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ अभी न होगा मेरा अंत

अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है।
मेरे जीवन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अन्त।
हरे-हरे ये पति।
डालियाँ कलियाँ कोमल गात!
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेसँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर।

शब्दार्थ-मृदुल = कोमल। वसंत = युवावस्था, उत्साहमय समय। पात = पत्ते। गात = शरीर। कर = हाथ। निद्रित = सोई हुई। प्रत्यूष = प्रात:काले। मनोहर = मन को वश में करने वाला, आनन्ददायक।

विशेष-
(1) यद्यपि कवि का जीवन प्रियजनों के विछोह से व्यथित है किन्तु वह हार मानने को तैयार नहीं है।
(2) कवि को विश्वास है कि उसकी सोतों को जगाने और हँसाने वाली काव्य रचना की यात्रा दूर तक जाएगी।
(3) भाषा भावों के अनुरूप तथा शैली भावुकता से पूर्ण है।
(4) काव्यांश में ‘डालियाँ, कलियाँ कोमल गात’ में अनुप्रास अलंकार, ‘स्वप्न-मृदुल-कर’ में उपमा तथा ‘निद्रित कलियों में मानवीकरण अलंकार है।
(5) काव्यांश सकारात्मक सोच और जीवन्त बने रहने का संदेश देता है।

2. पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लँगा मैं
अपने नव जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं
द्वार दिखा दूंगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त
अभी न होगा मेरा अंत।

शब्दार्थ-पुष्प = फूल। तन्द्रालस = शिथिलता और आलस्य। लालसा = तीव्र इच्छा। खींच लँगा = दूर कर दूंगा। नव = नया। अमृत = उत्साह, प्रेरणा। सींच दूंगा = भर दूंगा। अनन्त = जिसका अन्त न हो, परमात्मा।।

विशेष-
(1) कवि की जीवन में आस्था और उसका सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।
(2) कवि मृत्यु की चिंता से मुक्त है और जीवन का आनन्द लेने और देने में विश्वास करता है।
(3) ‘पुष्प-पुष्प’ में पुनरुक्ति प्रकाश ‘तन्द्रालस लालसा’, ‘सहर्ष सींच’ तथा ‘द्वार दिखा’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘नव जीवन का अमृत’ में रूपक का आभास है।
(4) काव्यांशों में लोकहित का संदेश निहित है।

(3) मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त।

शब्दार्थ-प्रथम चरण = जीवन का आरम्भिक समय। स्वर्ण-किरण = सुनहली किरणें, काल का समय। कल्लोल = लहर। बालक-मन = भोला हृदय। अविकसित = अनुभवहीन, अपूर्ण। राग = संगीत, काव्य रचना। दिगन्त = सारा आकाश, क्षितिज।

विशेष-
(1) कवि के अनुसार उसके जीवन में प्रथम बार वसंत जैसे उल्लास और उत्साहमय समय का आगमन हुआ। है। वह निरन्तर कर्मशील रहकर समाज के निराश और हताश लोगों में आत्मविश्वास का संचार करेगा।
(2) कवि ने अपने उत्साह और आत्मविश्वास से पूर्ण भावनाओं द्वारा निरन्तर सृजन में लगे रहने और मृत्यु के भय से मुक्त रहने का संदेश दिया है।
(3) ‘स्वर्ण-किरण कल्लोल’ में रूपक की झलक है।

मातृ-वदना-

नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणों पर, माँ
मेरे श्रम सिंचित सब फल।
जीवन के रथ पर चढ़ कर
सदा मृत्यु पथ पर बढ़कर
महाकाल के खरतर शर सह
सहूँ, मुझे तू कर दृढ़तर;
जागे मेरे उर में तेरी
मूर्ति अश्रु जल धौत विमल
दृग जल से पा बल बलि कर दें
जननि, जन्म श्रम संचित फल।

शब्दार्थ-नर जीवन = मनुष्य-रूप में प्राप्त वर्तमान जीवन। सकल = सारे। बलि = न्योछावर, बलिदान। श्रम = परिश्रम, मेहनत। सिंचित = सींचे हुए, परिश्रम से किए गए। मृत्युपथ = मृत्यु की ओर बढ़ता जीवन। महाकाल = समय, मृत्यु। खरतर = अधिक तीखे, पैने। शर = बाण, आघात। दृढ़तर = और अधिक दृढ़। उर = हृदय, मन। अश्रु = आँसू। धौत = धुली हुई। विमल = स्वच्छ। दृग जल = आँसू। जननि = माता। श्रम संचित = परिश्रम से प्राप्त।

विशेष-
(1) भाषा में तत्सम शब्दों की प्रधानता है। शब्द-चयन मनोभावों को व्यक्त करने में सफल है।
(2) शैली भावात्मक और समर्पणपरक है।
(3) ‘स्वार्थ सकल’, ‘खरतर शर’, ‘श्रम संचित’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘जीवन के रथ’ में रूपक अलंकार है।

(2)
बाधाएँ आएँ तन पर।
देखें तुझे नयन, मन भर
मुझे देख तू सजल दृगों से
अपलक, उर के शतदल पर;
क्लेद युक्त, अपना तन ढूँगा
मुक्त करूंगा, तुझे अटल
तेरे चरणों पर देकर बलि
सकल श्रेय श्रम संचित फल।

शब्दार्थ-सजल दृगों से = आँसू भरे नेत्रों से। अपलक = बिना पलक झपकाए, एकटक। शतदल = कमल। क्लेद = पसीना, कष्ट। मुक्त = स्वतन्त्र। श्रेय = श्रेष्ठ, प्रशंसनीय।

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश और विशेषताएं PDF हिंदी भाषा में डाउनलोड कर सकते हैं।


भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर PDF Download Link

Report This
If the download link of Gujarat Manav Garima Yojana List 2022 PDF is not working or you feel any other problem with it, please Leave a Comment / Feedback. If भारत वंदना कविता का भावार्थ, उद्देश्य, सारांश, विशेषताएं और प्रश्न उत्तर is a illigal, abusive or copyright material Report a Violation. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

Leave a Reply

Your email address will not be published.