PDFSource

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF Download

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF Download for free using the direct download link given at the bottom of this article.

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF Details
देवनागरी लिपि की विशेषताएँ
PDF Name देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF
No. of Pages 9
PDF Size 0.42 MB
Language English
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
Download LinkAvailable ✔
Downloads17
If देवनागरी लिपि की विशेषताएँ is a illigal, abusive or copyright material Report a Violation. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ

नमस्कार मित्रों, आज इस लएख के माध्यम से हम आप सभी को देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF प्रदान करने जा रहे हैं। अगर आप इसे पहले से ही इंटरनेट पर खोज रहे हैं, और ढूँढ पाने में असमर्थ हैं तो चिंता मत करिए, यह पोस्ट आपके लिए अत्यंत ही उपयोगी सिद्ध होगी। जैसा की आप सभी जानते ही होंगे कि देवनागरी एक भारतीय लिपि है। देवनागरी विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है।

हिन्दी व संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि के अंतर्गत अनेकों अलग – अलग भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएँ भी लिखी जाती हैं। देवनागरी लिपि बायें से दायें लिखी जाती है। जबकि कई अलग लिपि होती हैं जो दायें से बाएँ लिखी जाती हैं। संस्कृत, हिन्दी, मराठी, नेपाल भाषा भोजपुरी, आदि सैकड़ों भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं।

देवनागरी लिपि की विशेषताएं PDF / Devnagri Lipi Ki Visheshtayen PDF

देवनागरी लिपि की विशेषताएं निम्नलिखित है-

देवनागरी लिपि पर प्राय: दोषारोपण होता रहा है कि इस में वर्णों की संख्या अधिक है, परंतु वास्तविकता तो यह है कि यहां वर्णमाला का वर्गीकरण अत्यंत वैज्ञानिक है। इसके वर्ण सभी ध्वनियों को प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। पूरी वर्णमाला पहले स्वर, फिर व्यंजन में वर्गीकृत हैं। स्वरों का वर्गीकरण भी एक स्वर वर्ण के पश्चात दीर्घ वर्ण निश्चित है;

जैसे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:

व्यंजन वर्णों का वर्गीकरण कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य, ओष्ठ्य, अन्त:स्थ, ऊष्म, संयुक्त व्यंजन व द्विगुण व्यंजनों के रूप में वर्गीकृत हैं। पुनः व्यंजनों को अल्पप्राण महाप्राण अघोष व सघोष में वर्गीकृत किया गया है ऐसी विशेषता किसी अन्य लिपि में नहीं पाई जाती है।

स्वर ध्वनियों के उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की सहायता नहीं लेनी पड़ती है परंतु व्यंजन के उच्चारण में अन्य ध्वनि की सहायता लेनी पड़ती है।

इस लिपि में शब्दों को लिखने के क्रम में स्वर और व्यंजन वर्ण अलग-अलग नहीं लिखे जाते हैं, बल्कि संयुक्त होकर पूर्ण अक्षर का निर्माण करते हैं जैसे कमल, कलम

अक्षरा तमक लिपि में वर्ण के ऊपर नीचे दाएं बाएं कहीं भी मात्राओं का प्रयोग हो सकता है परंतु उच्चारण पहले वर्ण का होगा और उसके पश्चात मात्राएं उच्चारित होगी जैसे: कोमल, कुम्हार, कोयल, किताब।

देवनागरी लिपि में सभी ध्वनियों को अंकित करने की क्षमता है परंतु रोमन लिपि में ऐसा नहीं है:

जैसे – ण, न के लिए N अक्षर

द, ड के लिए D अक्षर

देवनागरी लिपि की विशेषताएं बताइए

  • लिपि चिह्नों के नाम ध्वनि के अनुसार-

इस लिपि में चिह्नों के द्योतक उसके ध्वनि के अनुसार ही होते हैं और इनका नाम भी उसी के अनुसार होता है जैसे- अ, आ, ओ, औ, क, ख आदि। किंतु रोमन लिपि चिह्न नाम में आई किसी भी ध्वनि का कार्य करती है, जैसे- भ्(अ) ब्(क) ल्(य) आदि। इसका एक कारण यह हो सकता है कि रोमन लिपि वर्णात्मक है और देवनागरी ध्वन्यात्मक।

  • लिपि चिह्नों की अधिकता –

विश्व के किसी भी लिपि में इतने लिपि प्रतीक नहीं हैं। अंग्रेजी में ध्वनियाँ 40 के ऊपर है किंतु केवल 26 लिपि-चिह्नों से काम होता है। ‘उर्दू में भी ख, घ, छ, ठ, ढ, ढ़, थ, ध, फ, भ आदि के लिए लिपि चिह्न नहीं है। इनको व्यक्त करने के लिए उर्दू में ‘हे’ से काम चलाते हैं’ इस दृष्टि से ब्राह्मी से उत्पन्न होने वाली अन्य कई भारतीय भाषाओं में लिपियों की संख्याओं की कमी नहीं है। निष्कर्षत: लिपि चिह्नों की पर्याप्तता की दृष्टि से देवनागरी, रोमन और उर्दू से अधिक सम्पन्न हैं।

  • स्वरों के लिए स्वतंत्र चिह्न –

देवनागरी में ह्स्व और दीर्घ स्वरों के लिए अलग-अलग चिह्न उपलब्ध हैं और रोमन में एक ही (।) अक्षर से ‘अ’ और ‘आ’ दो स्वरों को दिखाया जाता है। देवनागरी के स्वरों में अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

  • व्यंजनों की आक्षरिकता –

इस लिपि के हर व्यंजन के साथ-साथ एक स्वर ‘अ’ का योग रहता है, जैसे- च्+अ= च, इस तरह किसी भी लिपि के अक्षर को तोड़ना आक्षरिकता कहलाता है। इस लिपि का यह एक अवगुण भी है किंतु स्थान कम घेरने की दृष्टि से यह विशेषता भी है, जैसे- देवनागरी लिपि में ‘कमल’ तीन वर्णों के संयोग से लिखा जाता है, जबकि रोमन में छ: वर्णों का प्रयोग किया जाता है!

  • सुपाठन एवं लेखन की दृष्टि-

किसी भी लिपि के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण होता है कि उसे आसानी से पढ़ा और लिखा जा सके इस दृष्टि से देवनागरी लिपि अधिक वैज्ञानिक है। उर्दू की तरह नहीं, जिसमें जूता को जोता, जौता आदि कई रूपों में पढ़ने की गलती अक्सर लोग करते हैं।

स्पष्ट होती है क्योंकि इसके कारण वर्ण व शब्दों के बीच अंतर किया जा सकता है।

देवनागरी लिपि का मानकीकरण / Devnagri Lipi ka Mankikaran in Hindi

 देवनागरी नागरी लिपि विश्व के अन्य देशों की तुलना में वैज्ञानिक है।किसी भी लिपि के आदर्श होने के लिए निम्नलिखित शर्ते होना अनिवार्य हैं।

१. वह लिपि दुनिया के किसी भी भाषा को अंतरित करने की क्षमता रखती हो।

२. प्रत्येक ध्वनि के लिए स्वतंत्र वर्ण प्रतीक हो।

३. किसी वर्ण प्रतीक से एक से अधिक ध्वनि उच्चारित न हो।

४. शब्दों को लेकर लिपि अर्थभेद ना हो।

५. उस लिपि में भूमंडल की नीति होने की अर्हता हो।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर देवनागरी लिपि निश्चित तौर पर वैज्ञानिक है, परंतु कुछ समस्याओं के कारण यह मानकीकरण की दिशा में उलझी हुई है इसकी मानकता के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं –

१. शिरोरेखा के प्रयोग को अनिवार्य कर देना चाहिए। इससे वर्णों के बीच भेद किया जा सकेगा। शिरोरेखा के अभाव में ध-घ, ख-व, र-व, म-भ का अंतर स्पष्ट नहीं हो पाता।

२. ध्वनियों के उच्चारण में एकरूपता अति आवश्यक हैं। इस लिपि के वनों की द्विरूपता को समाप्त कर देना चाहिए जैसे;

अ श्र था ण झ ट ल क्त त त्र आदि।

३. संयुक्त वर्णों का प्रयोग संयोग लेखन उच्चारण लाघवता व तीव्रता को दर्शाता है। इसे भी बनाए रखा जाए जैसे क्ष त्र ज्ञ आदि

४. वर्णों को संयुक्त करने की प्रक्रिया चाहे आस-पास हो या ऊपर नीचे दोनों ही स्थितियों में वैज्ञानिक है जैसे मिट्टी  , लट्टू

५. ‘र’ ध्वनि के चारों प्रयोग वस्तुतः अलग-अलग न होकर ‘र’ के को कोणीय परिवर्तन मात्र है। इनका प्रयोग हुबहू किया जाए।

६. ‘र’ का चौथा प्रयोग मूर्धन्य वर्णों में किया जाता है राष्ट्र ट्रक ड्रम आदि

७. संज्ञा शब्दों के अंत में ‘ई’का प्रयोग होना चाहिए यी का नहीं;

जैसे भलाई पिटाई कमाई पढ़ाई आदि।

८. नासिक ध्वनियों एवं उन में प्रयुक्त वर्ण प्रतीकों के संयोग को लेकर यदि सजग रहा जाए तो इनमें से किसी प्रयुक्त को हटाने की जरूरत नहीं है। ये सभी प्रतीक एक दूसरे से अलग हुआ अर्थभेदक हैं। नासिक वर्णों को अनुस्वार तथा अनुनासिक में बांटा जाता है। अनुस्वार ध्वनियों के उच्चारण में नाक की भूमिका होती है जबकि अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में नाक और मुख दोनों का  सहयोग होता है।

९. अनुस्वार ध्वनियों के उच्चारण में बिंदी या बिंदु के प्रतीक का उपयोग होता है जबकि अनुनासिक ध्वनियों के लिए अर्थ चंद्रबिंदु का प्रयोग होता है।

१०. अनुस्वार धनिया प्रत्येक वर्ण के पंचम अक्षरों के रूप में ही जानी जाती है जबकि अनुनासिक ध्वनियां अलग-अलग होती है। अनुस्वर ध्वनियों या पंचम अक्षरों के लिए प्रति स्थापक प्रतीक बिंदी या बिंदु के अतिरिक्त कहीं-कहीं अर्द्ध पंचमाक्षर का प्रयोग भ्रम का कारण हो सकता है परंतु या प्रयोग वैज्ञानिक है।

नीचे दिये गए लिंक का उपयोग करके आप Devnagri Lipi Ki Visheshtayen PDF (देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF) आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं।


देवनागरी लिपि की विशेषताएँ PDF Download Link

Report This
If the download link of Gujarat Manav Garima Yojana List 2022 PDF is not working or you feel any other problem with it, please Leave a Comment / Feedback. If देवनागरी लिपि की विशेषताएँ is a illigal, abusive or copyright material Report a Violation. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

RELATED PDF FILES

Leave a Reply

Your email address will not be published.