देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadashi Vrat Katha PDF in Hindi

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देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadashi Vrat Katha PDF Details
देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadashi Vrat Katha
PDF Name देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadashi Vrat Katha PDF
No. of Pages 7
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Language Hindi
CategoryEnglish
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देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadashi Vrat Katha Hindi

नमस्कार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए देवशयनी एकादशी व्रत कथा / Devshayani Ekadashi Vrat Katha PDF in Hindi प्रदान करने जा रहे हैं। सनातन हिन्दू धर्म में देवशयनी एकादशी को बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। एकादशी का व्रत भगवान श्री हरी विष्णु जी को समर्पित होता है। हिन्दू धर्म में विष्णु जी को बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का आरंभ हो जाता है।

चातुर्मास के अंतर्गत कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसके बाद उन्हें चार माह बाद देवउठनी एकादशी के दिन उठाया जाता है। देवशयनी एकादशी को देव देवशयनी, महा एकादशी, हरि देवशयनी, पद्मनाभा, शयनी तथा प्रबोधनी एकादशी तथा तेलुगू भाषा में थोली एकादशी के भी कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष में २४ एकादशी होती है तथा जिस वर्ष में अधिक मास आता है उस वर्ष में २६ एकादशी होती है। हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है।

सभी एकादशी विष्णु जी को समर्पित होती है। एकादशी का व्रत करने भगवान विष्णु जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अंत समय में सुख भोगकर भगवान विष्णु जी की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। तो भक्तों अगर आप भी भगवान विष्णु जी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं तो देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक अवश्य करें इसी के साथ देवशयनी एकादशी व्रत कथा भी अवश्य पढ़ें। बिना कथा श्रवण किए और पढ़े व्रत का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा इन हिंदी / Devshayani Ekadashi Vrat Katha in Hindi PDF

अर्जुन ने कहा- “हे श्रीकृष्ण! आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या व्रत है? उस दिन किस देवता का पूजन होता है? उसका क्या विधान है? कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक बतायें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे धनुर्धर! एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से यही प्रश्न पूछा था। तब ब्रह्माजी ने कहा कि नारद! तुमने कलियुग में प्राणिमात्र के उद्धार के लिए सबसे श्रेष्ठ प्रश्न पूछा है, क्योंकि एकादशी का व्रत सब व्रतों में उत्तम होता है। इसके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी है।

यह व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- मान्धाता नाम का एक सूर्यवंशी राजा था। वह सत्यवादी, महान तपस्वी और चक्रवर्ती था। वह अपनी प्रजा का पालन सन्तान की तरह करता था। उसकी सारी प्रजा धन-धान्य से परिपूर्ण थी और सुखपूर्वक जीवन-यापन कर रही थी। उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।

कभी किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा नहीं आती थी, परन्तु न जाने उससे देव क्यों रूष्ट हो गये। न मालूम राजा से क्या भूल हो गई कि एक बार उसके राज्य में जबरदस्त अकाल पड़ गया और प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यन्त दुखी रहने लगी। राज्य में यज्ञ होने बन्द हो गए। अकाल से पीड़ित प्रजा एक दिन दुखी होकर राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी- ‘हे राजन! समस्त संसार की सृष्टि का मुख्य आधार वर्षा है।

इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड़ गया है और अकाल से प्रजा मर रही है। हे भूपति! आप कोई ऐसा जतन कीजिये, जिससे हम लोगों का कष्ट दूर हो सके। यदि जल्द ही अकाल से मुक्ति न मिली तो विवश होकर प्रजा को किसी दूसरे राज्य में शरण लेनी पड़ेगी।’

प्रजाजनों की बात सुन राजा ने कहा- ‘आप लोग सत्य कह रहे हैं। वर्षा न होने से आप लोग बहुत दुखी हैं। राजा के पापों के कारण ही प्रजा को कष्ट भोगना पड़ता है। मैं बहुत सोच-विचार कर रहा हूँ, फिर भी मुझे अपना कोई दोष दिखलाई नहीं दे रहा है। आप लोगों के कष्ट को दूर करने के लिए मैं बहुत उपाय कर रहा हूँ, परन्तु आप चिन्तित न हों, मैं इसका कोई-न-कोई उपाय अवश्य ही करूँगा।’

राजा के वचनों को सुन प्रजाजन चले गये। राजा मान्धाता भगवान की पूजा कर कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को साथ लेकर वन को चल दिया। वहाँ वह ऋषि-मुनियों के आश्रमों में घूमते-घूमते अन्त में ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पर पहुँच गया। रथ से उतरकर राजा आश्रम में चला गया।

वहाँ ऋषि अभी नित्य कर्म से निवृत्त ही हुए थे कि राजा ने उनके सम्मुख पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया। ऋषि ने राजा को आशीर्वाद दिया, फिर पूछा- ‘हे राजन! आप इस स्थान पर किस प्रयोजन से पधारे हैं, सो कहिये।’

राजा ने कहा- ‘हे महर्षि! मेरे राज्य में तीन वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है। इससे अकाल पड़ गया है और प्रजा कष्ट भोग रही है। राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है, ऐसा शास्त्रों में लिखा है। मैं धर्मानुसार राज्य करता हूँ, फिर यह अकाल कैसे पड़ गया, इसका मुझे अभी तक पता नहीं लग सका। अब मैं आपके पास इसी सन्देह की निवृत्ति के लिए आया हूँ।

आप कृपा कर मेरी इस समस्या का निवारण कर मेरी प्रजा के कष्ट को दूर करने के लिए कोई उपाय बतलाइये।’ सब वृत्तान्त सुनने के बाद ऋषि ने कहा- ‘हे नृपति! इस सतयुग में धर्म के चारों चरण सम्मिलित हैं। यह युग सभी युगों में उत्तम है। इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही तप करने तथा वेद पढ़ने का अधिकार है, किन्तु आपके राज्य में एक शूद्र तप कर रहा है।

इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। यदि आप प्रजा का कल्याण चाहते हैं तो शीघ्र ही उस शूद्र का वध करवा दें। जब तक आप यह कार्य नहीं कर लेते, तब तक आपका राज्य अकाल की पीड़ा से कभी मुक्त नहीं हो सकता।’ ऋषि के वचन सुन राजा ने कहा- ‘हे मुनिश्रेष्ठ! मैं उस निरपराध तप करने वाले शूद्र को नहीं मार सकता।

किसी निर्दोष मनुष्य की हत्या करना मेरे नियमों के विरुद्ध है और मेरी आत्मा इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करेगी। आप इस दोष से मुक्ति का कोई दूसरा उपाय बतलाइये।’

राजा को विचलित जान ऋषि ने कहा- ‘हे राजन! यदि आप ऐसा ही चाहते हो तो आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी नाम की एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा भी पूर्व की भाँति सुखी हो जाएगी, क्योंकि इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला है और कष्टों से मुक्त करने वाला है।’

ऋषि के इन वचनों को सुनकर राजा अपने नगर वापस आ गया और विधानपूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से राज्य में अच्छी वर्षा हुई और प्रजा को अकाल से मुक्ति मिली।

इस एकादशी को पद्मा एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत के करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, अतः मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को इस एकादशी का व्रत करना चाहिए। चातुर्मास्य व्रत भी इसी एकादशी के व्रत से आरम्भ किया जाता है।”

कथा-सार

अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किसी दूसरे का बुरा नहीं करना चाहिए। अपनी शक्ति से और भगवान पर पूरी श्रद्धा और आस्था रखकर सन्तों के कथनानुसार सत्कर्म करने से बड़े-बड़े कष्टों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा / Devshayani Ekadashi 2022 Hindi Katha PDF

यहाँ आप देवशयनी एकादशी की दूसरी व्रत कथा भी पढ़ सकते हैं –

एक बार युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से आषाढ़ शुक्ल एकादशी व्रत के महत्व को बताने को कहा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इसे देवशयनी एकादशी के नाम से जानते हैं। एक बार नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से आषाढ़ शुक्ल एकादशी के महत्व और विधि के बारे में पूछा था। वह कथा तुम्हें बताते हैं।

नारद जी के पूछने पर ब्रह्मा जी ने कहा कि नारद, तुमने मनुष्यों के उद्धार के लिए अच्छा प्रश्न किया है। इस व्रत को पद्मा एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इसकी कथा इस प्रकार से है –

सूर्यवंश में एक महान प्रतापी राजा मांधाता हुए, जो एक चक्रवती राजा थे। वह अपनी प्रजा की पूरी देखभाल करते थे। उनका राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण था। उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ा था। एक समय की बात है। लगातार तीन साल तक बारिश नहीं हुई और अकाल पड़ गया।

अकाल के कारण उनकी प्रजा काफी कष्ट में रह रही थी, वे सभी दुखी थे। अन्न और धान्य की कमी के कारण यज्ञ जैसे धार्मिक कार्य भी बंद हो गए। प्रजा परेशान होकर राजा के दरबार में पहुंची और कहा कि हे राजन! इस अकाल से चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, बारिश के अभाव में अकाल पड़ गया है। इस वजह से मनुष्य भी मर रहे हैं। इसका कुछ उपाय खोजना होगा।

राजा ने कहा कि ठीक है। वे एक दिन अपने कुछ सैनिकों के साथ जंगल में गए और अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने आने का कारण पूछा, तो राजा ने सबकुछ बताया। तब अंगिरा ऋषि ने राजा मांधाता को आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत करने को कहा।

इस व्रत को करने से सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। तुम अपने सभी मंत्रियों और प्रजा के साथ इस व्रत को करो। समस्या का समाधान हो तत्काल हो जाएगा। ऋषि अंगीरा के सुझाव के अनुसार ही राजा मांधाता ने पूरी प्रजा के साथ देवशयनी एकादशी का व्रत  पूरे विधि-विधान से किया। इस व्रत के प्रभाव से वर्षा हुई। अकाल से मुक्ति मिली और फिर से राज्य धन-धान्य से संपन्न हो गया।

इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि देवशयनी एकादशी व्रत के कथा को सुनने से समस्त पापों का नाश होता है तथा भगवान श्री हरी विष्णु जी कि विशेष कृपा प्राप्त होने से इस व्रत को करने से भक्तों को मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा विधि / Devshayani Ekadashi Vrat Puja Vidhi

यहाँ आप देवशयनी एकादशी की पूजन विधि के बारे में आसानी से जान सकते हैं –

  • देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्री हरी विष्णु जी का पूजन तथा आराधना की जाती है।
  • इस दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • तदोपरांत मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को आसन पर स्थापित करें।
  • ध्यान रखें आसन पर पीला रंग का वस्त्र अवश्य बिछाएं।
  • इसके बाद भगवान विष्णु जी को चंदन का तिलक लगाएं।
  • अब फूलों की माला चढ़ाएं और घी का दीपक भगवान के सामने प्रज्ज्वलित करें।
  • मान्यता है कि एकादशी के दिन दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • इसीलिए हो सकते तो अपनी श्रद्धानुसार निर्बल तथा असहाय को दान अवश्य करें।

देवशयनी एकादशी का महत्व / Devshayani Ekadashi Ka Mahatva

देवशयनी एकादशी को सौभाग्य की एकादशी के माना जाता है। पद्म पुराण का अनुसार इस दिन उपवास करने से जाने-अनजाने में किए गए सभी प्रकार ले पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन नियमपूर्वक पूजा करने से सभी भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में 16 संस्कारों का आदेश नहीं है अर्थात इस एकादशी के दिन से चार मास तक कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। इस अवधि में पूजा, अनुष्ठान, घर या कार्यालय की मरम्मत, गृह प्रवेश, ऑटोमोबाइल खरीद और आभूषण की खरीद की जा सकती है।

देवशयनी एकादशी व्रत के लाभ / Devshayani Ekadashi Vrat Benefits

  • एकादशी का व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
  • ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है, इस व्रत के करने से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • देवशयनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं तथा इस व्रत के प्रभाव से भक्तों को मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • इस व्रत को करने से मन शुद्ध होता है तथा व्रत के प्रभाव से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति का भाव बना रहता है।
  • देवशयनी एकादशी का व्रत करने से भगवान श्री विष्णु जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • जो भक्त विधि-पूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें पुण्य फल की प्राप्ति होती है तथा शारीरिक कष्ट दूर होता है।
  • ऐसा माना जाता है कि देवशयनी एकादशी व्रत कथा सुनने मात्र से संकट कटते हैं और पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

देवशयनी एकादशी मुहूर्त / Devshayani Ekadashi Muhurat

देवशयनी एकादशी रविवार, जुलाई 10, 2022 को है।
एकादशी तिथि प्रारम्भ – जुलाई 09, 2022 को 04:39 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – जुलाई 10, 2022 को 02:13 पी एम बजे
11 जुलाई को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 05:31 ए एम से 08:17 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:13 ए एम

Devshayani Ekadashi 2022 Vrat Katha

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