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भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha Hindi PDF Download

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भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha PDF Details
भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha
PDF Name भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha PDF
No. of Pages 4
PDF Size 1.32 MB
Language Hindi
Categoryहिन्दी | Hindi
Source pdfsource.org
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भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा | Bhadrapada Purnima Vrat Katha Hindi

नमस्कार पाठको वह आज हम आपके लिए भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा PDF / Bhadrapada Purnima Vrat Katha PDF लाए हैं। भाद्रपद पूर्णिमा हिंदू कैलेंडर में एक विशेष दिन है, और इसे उपवास या व्रत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को पूर्णिमा या पूर्णिमा के दिन के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन, भक्त पूजा करते हैं और भाद्रपद पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करते हैं।

यह व्रत कथा बताती है कि कैसे भगवान विष्णु ने एक वराह का रूप धारण किया और पृथ्वी को समुद्र की गहराई से बचाया। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसलिए, यदि आप अपनी आत्मा को शुद्ध करना चाहते हैं और नए सिरे से शुरुआत करना चाहते हैं, तो भाद्रपद पूर्णिमा व्रत का पालन करें। और, भाद्रपद पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करना न भूलें।

भाद्रपद (भादो) पूर्णिमा कथा PDF / Bhadrapada Purnima Vrat Katha Pdf

पौराणिक कथाओं के मुताबिक द्वापर युग में एक बार यशोदा मां ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह उन्हें एक ऐसा व्रत बताएं जिसको करने से मृत्यु लोक में स्त्रियों को विधवा होने का भय ना रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने यशोदा मां को बताया कि स्त्रियों को 32 पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए। यह व्रत अचल सौभाग्य देने वाला और भगवान शिव के प्रति मनुष्यों की भक्ति बढ़ाने वाला है।

योशादा मां ने श्रीकृष्ण से पूछा कि क्या इस व्रत को मृत्युलोक में किसी ने किया था? इस पर भगवान ने बताया कि कार्तिका नाम की नगरी थी, वहां चंद्रहास नामक एक राजा राज करता है। उसी नगरी में धनेश्वर नाम के ब्राम्हण की पत्नी रूपवती थी। दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते थे और उस नगरी में बहुत प्रेम से रहते थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन संतान ना होने के कारण वह अक्सर दुखी रहा करते थे। एक दिन एक योगी उस नगरी में आया, वह नगर के सभी घरों से भिक्षा लेता था।

लेकिन रूपवती के घर से भिक्षा नहीं लेता था। एक दिन दुखी होकर धनेश्वर, योगी से भिक्षा ना लेने की वजह पूछता है। इस पर योगी ने कहा कि निसंतान के घर की भीख पतिथों के अन्न के समान होती है और जो पतिथो का अन्न ग्रहण करता है वह भी पतिथ हो जाता है। इसलिए पतिथ हो जाने के भय से उनके घर की भिक्षा नहीं लेता है। इसे सुन धनेश्वर दुखी हो गए और उन्होंने योगी से पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा।

इस पर योगी ने मां चंडी की उपासना करने की सलाह दी। धनेश्वर देवी चंडी की उपासना करने के लिए वन में चला गया, मां चंडी ने धनेश्वर की भक्ति से प्रसन्न होकर 16वें दिन दर्शन दिया। मां चंडी ने कहा कि तुम्हारा पुत्र होगा, लेकिन वह केवल 16 वर्षों तक ही जीवित रहेगा। यदि वह स्त्री और पुरुष 32 पूर्णिमा का व्रत करेंगे तो वह दीर्घायु हो जाएगा।

मां चंडी ने एक आम के वृक्ष पर चढ़कर फल तोड़कर उसे पत्नी को खिलाने को कहा। मां चंडी ने कहा कि तुम्हारी पत्नी स्नान कर शंकर भगवान का ध्यान कर फल को खा ले, तो भगवान शिव की कृपा से गर्भवती हो जाएगी। इस उपाय को करने के बाद धनेश्वर को पुत्र की प्राप्ति हुई तथा 32 पूर्णिमा का व्रत करने से पुत्र को दीर्घायु की प्राप्ति हुई।

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