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विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha PDF in Hindi

विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha Hindi PDF Download

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विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha PDF Details
विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha
PDF Name विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha PDF
No. of Pages 4
PDF Size 0.56 MB
Language Hindi
Categoryहिन्दी | Hindi
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Tags: , If विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha is a illigal, abusive or copyright material Report a Violation. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

विनायक चतुर्थी व्रत कथा | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha Hindi

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको विनायक चतुर्थी व्रत कथा PDF / Vinayaka Chaturthi Vrat Katha PDF in Hindi के लिए डाउनलोड लिंक दे रहे हैं। गणेश चतुर्थी का इंतजार लोगों को बेसब्री से रहता है। इस त्योहार को लोग गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश चतुर्थी का आगाज होता है। इस बार गणेश चतुर्थी 31 अगस्त को है।

लोग गणेश चतुर्थी पर मैसेज, फोटोज, शायरी, कविताओं, श्लोक भेजकर शुभकामनाएं भी देते हैं। इस गणेश चतुर्थी आप भी इन मजेदार मैसेज, कोट्स, शायरी, श्लोकों, दोहों को भेजकर सबसे पहले गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं भेजें।

विनायक चतुर्थी व्रत कथा PDF | Vinayaka Chaturthi Vrat Katha PDF in Hindi

एक दिन भगवान भोलेनाथ स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगवती गए। महादेव के प्रस्थान करने के बाद मां पार्वती ने स्नान प्रारंभ किया और घर में स्नान करतो हुए अपने मैल से एक पुतला बनाकर और उस पुतले में जान डालकर उसको सजीव किया गया। पुतले में जान आने के बाद देवी पार्वती ने पुतले का नाम गणेश रखा। पार्वती जी ने बालक गणेश को स्नान करते जाते वक्त मुख्य द्वार पर पहरा देने के लिए कहा। माता पार्वती ने कहा कि जब तक में स्नान करके न आ जाऊं किसी को भी अंदर नहीं आने देना।

भोगवती में स्नान कर जब श्रीगणेश अंदर आने लगे तो बाल स्वरूप गणेश ने उनको द्वार पर रोक दिया। भगवान शिव के लाख कोशिश के बाद भी गणेश ने उनको अंदर नहीं जाने दिया। गणेश द्वारा रोकने को उन्होंने अपना अपमान समझा और बालक गणेश का सर धड़ से अलग कर वो घर के अंदर चले गए। शिवजी जब घर के अंदर गए तो वह बहुत क्रोधित अवस्था में थे। ऐसे में देवी पार्वती ने सोचा कि भोजन में देरी की वजह से वो नाराज हैं, इसलिए उन्होंने दो थालियों में भोजन परोसकर उनसे भोजन करने का निवेदन किया।

दो थालियां लगी देखकर शिवजी ने उनसे पूछा कि दूसरी थाली किसके लिए है? तब शिवजी ने जवाब दिया कि दूसरी थाली पुत्र गणेश के लिए है, जो द्वार पर पहरा दे रहा है। तब भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि उसका सिर मैने क्रोधित होने की वजह से धड़ से अलग कर दिया। इतना सुनकर पार्वतीजी दुखी हो गई और विलाप करने लगी। उन्होंने भोलेनाथ से पुत्र गणेश का सिर जोड़कर जीवित करने का आग्रह किया। तब महादेव ने एक हाथी के बच्चे का सिर धड़ काटकर गणेश के धड़ से जोड़ दिया। अपने पुत्र को फिर से जीवित पाकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुई। कहा जाता है कि जिस तरह शिव ने श्रीगणेश को नया जीवन दिया था, उसी तरह भगवान गणेश भी नया जीवन अर्थात आरम्भ के देवता माने जाते हैं।

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