मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र PDF in Hindi

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र Hindi PDF Download

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मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र PDF Details
मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र
PDF Name मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र PDF
No. of Pages 3
PDF Size 0.16 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
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मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र Hindi

मानसकार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र PDF in Hindi / Marusthali Paristhitik Tantra PDF प्रदान करने जा रहे हैं। पृथ्वी के ऐसे भू-भाग जहां पर औसत वार्षिक वर्षा 25 से.मि. से कम होती है ऐसे क्षेत्रों को मरुस्थल के नाम से जाना जाता है। मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल की अधिकांश कमी पाई जाती है।

मरुस्थलीय क्षेत्रों के अंतर्गत ऐसे क्षेत्र सम्मिलित होते हैं, जहां पर तापक्रम तो अधिक होता है परंतु जल की विशेष कमी होती है, इसलिए मरुस्थलीय स्थानों पर पेड़-पौधों एवं जंतुओ की संख्या में भी कमी पाई जाती है। इस लेख के माध्यम से आप मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पीडीएफ़ के बारे में आसानी से विस्तृत रूप में जान पाएंगे।

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र PDF / Marusthali Paristhitik Tantra PDF

जलवायु परिस्थितियों के आधार पर मरुस्थल तीन प्रमुख प्रकार के होते हैं-

  1. अफ्रीका में सहारा और नामीबिया और राजस्थान भारत में थार मरुस्थल जैसे उष्णकटिबंधीय मरुस्थल केवल कुछ प्रजातियों के साथ सबसे शुष्क हैं। हवा में उड़ने वाले रेत के टीले बहुत आम हैं।
  2. दक्षिणी कैलिफोर्निया में मोजावे जैसे समशीतोष्ण मरुस्थल जहां गर्मियों में दिन का तापमान बहुत गर्म होता है लेकिन सर्दियों में ठंडा होता है।
  3. चीन के गोबी मरुस्थल जैसे ठंडे मरुस्थलों में सर्द सर्दियाँ और गर्म ग्रीष्मकाल होती हैं।

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का वर्णन कीजिए

  • मरुस्थलीय पौधों और जंतुओं में जल संरक्षण के लिए सर्वाधिक विशिष्ट अनुकूलन होते हैं।
  • कई मरुस्थलीय पौधों में कम, पपड़ीदार पत्तियां पाई जाती हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन के कारण पानी की कमी को कम किया जा सके या पानी जमा करने के लिए रसीले पत्ते हों।
  • कई बार उनके तने चपटे हो जाते हैं और क्लोरोफिल विकसित कर लेते हैं ताकि वे प्रकाश संश्लेषण का कार्य कर सकें।
  • कुछ पौधे भूजल के दोहन के लिए बहुत गहरी जड़ें दिखाते हैं। वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से पानी की कमी को कम करने के लिए कई पौधों में पत्ती के ऊपर एक मोमी, मोटी छल्ली होती है।
  • मरुस्थलीय जंतु जैसे कीड़े और सरीसृप में पानी की हानि को कम करने के लिए मोटी बाहरी आवरण होता है। वे आमतौर पर बिलों के अंदर रहते हैं जहां नमी बेहतर होती है और गर्मी कम होती है।
  • मरुस्थलीय मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर होती है लेकिन पानी की कमी होती है।

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का वर्णन / Marusthali Paristhitik Tantra Ka Varnan

मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र में निम्न लिखित तीन घटक होते है-
अजैविक घटक (Abiotic Components)

  • अकार्बनिक घटक- मृदा , जल (कम मात्रा में ), वायु (तेज प्रवाह), प्रकाश(तीव्र), खनिज तत्व , गैसें जैसें- CO2, N2, K2  आदि
  • कार्बनिक घटक – कार्बोहईड्रेट्स, प्रोटीन्स, लिपिड्स, एमिनो, अम्ल आदि।

जैविक घटक(Biotic Components)

  • उत्पाद- इसके अंतर्गत घनी झाड़ियाँ, कुछ प्रकार के घास तथा कुछ हरे पौधे जैसे- नागफनी, बाबुल, कंटीले पौधे आदि पाये जाते है।
  • उपभोक्ता- मरुस्त्थलीय  पारिस्थितिक तंत्र में भी तीन प्रकार के उपभोक्ता पाए जााते हैं

अपघटक

  • चूँकि मरुस्थलों में वनस्पत्तियों की कमी होती है अतः यहाँ पर अपघटको की संख्या काम होती है।  यहॉँ पर ऐसे कवक और जीवाणु अपघटक के रूप में पाए जाते हैं। जिनमे उच्च ताप को सहने की क्षमता होती है।

(1)प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers)

सभी उपभोक्ता जो शाकाहारी(Herbivorus)  होते हैं, तथा अपने भोजन हेतु उत्पादकों पर निर्भर होते है। प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं।

उदाहरण – कीड़े- मकोड़े, गाय, बैल, भैंस, भेंड़, बकरियां, घोड़े, गधे ,चूहे, हिरण आदि।

(2)द्वितीयक उपभोक्ता (Secondry Consumers)

इसके अंतर्गत घास के मैदान में उपस्थित वे सभी मांसाहारी जन्तु आते हैं जो शाकाहारी जन्तुओ का शिकार करते हैं उनका मांस खाते गई।

उदाहरण – साँप, भेड़िया, लकड़बग्घा, कौआ आदि ।

(3)तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumers)

वो जन्तु जो अपना भोजन हेतु द्वितीयक उपभोक्ताओं पर आश्रित है , तथा उनका शिकार  करके अपना भरण पोषण करते हैं। जिन्हें सर्वोच्च मांसाहारी (Top Carnivorous) जन्तु भी कहते है।

उदाहरण – बाझ, सिंह, शेर, चिता आदि।

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