नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha PDF in Hindi

नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha Hindi PDF Download

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नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha PDF Details
नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha
PDF Name नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha PDF
No. of Pages 6
PDF Size 1.00 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
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नारद मुनि के जन्म की कथा | Narad Muni Janam Katha Hindi

नमस्कार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए नारद मुनि के जन्म की कथा / Narad Muni Janam Katha PDF प्रदान करने जा रहे हैं। सनातन हिन्दू धर्म में नारद मुनि जी की बहुत-सी कथाएँ वर्णित है। हिन्दू धार्मिक पुराणों में नारद मुनि जी का बहुत ही  महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है। नारद मुनि जी के पिता का नाम ब्रह्मा जी हैं।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा जी के छः पुत्र थे, जिनमें से नारद मुनि, उनके छठे पुत्र थे। नारद मुनि जी भगवान श्री हरी विष्णु जी के अनन्य भक्तों में से एक जाने जाते है। धार्मिक पुराणों के अनुसार नारद जी भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के दशवें अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार किया था।

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार यह माना जाता है कि सृष्टि में भगवान विष्णु जी ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार लिया था और सात्वततंत्र अथवा नारद-पांचरात्र का उपदेश दिया था, जिसमें सात्विक कर्मों के माध्यम से संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। नारद जी मुनियों के देवता थे और इसीलिए उन्हें “ऋषिराज” के नाम से भी जाना जाता था।

भगवान नारद मुनि की कहानी / Narad Muni Ki Kahani Hindi PDF

  • नारद जन्म की कथा –देवर्षि नारद पहले गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्मा जी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आए। नारद जी भी अपनी स्त्रियों के साथ उस सभा में गए। भगवान के संकीर्तन में विनोद करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें शाप दे दिया।
  • जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण-पोषण करने लगीं। एक दिन गांव में कुछ महात्मा आए और चातुर्मास्य बिताने के लिए वहीं ठहर गए। नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वह खेलकूद छोड़ कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से करते थे।
  • संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो यह तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग इन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे देते थे। साधुसेवा और सत्संग अमोघ फल प्रदान करने वाला होता है। उसके प्रभाव से नारद जी का हृदय पवित्र हो गया और इनके समस्त पाप धुल गए। जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर इन्हें भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया।
  • एक दिन सांप के काटने से उनकी माता जी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिए चल पड़े।
  • एक दिन जब नारद जी वन में बैठकर भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गए और थोड़ी देर तक अपने दिव्य स्वरूप की झलक दिखाकर अन्तर्धान हो गए। भगवान का दोबारा दर्शन करने के लिए नारद जी के मन में परम व्याकुलता पैदा हो गई।
  • वह बार-बार अपने मन को समेट कर भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे, किंतु सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशावाणी हुई, ‘‘अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।’’ समय आने पर नारद जी का पांच भौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए।
  • देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। यह भगवान की भक्ति और महात्म्य के विस्तार के लिए अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद् गुणों का गान करते हुए निरंतर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्ति सूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुंदर व्याख्या है। अब भी यह अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं।
  • भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही उन्हें भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिए ही है। यह ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भंडार, आनंद के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं।
  • अविरल भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है। वह विष्णु के महानतम भक्तों में माने जाते हैं और इन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है। भगवान विष्णु की कृपा से यह सभी युगों और तीनों लोगों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं।
अन्य नाम देवर्षि , ब्रह्मनंदन , सरस्वतीसुत , वीणाधर आदि।
संबंध हिन्दू देवता, देवर्षि, मुनि
निवासस्थान ब्रह्मलोक
मंत्र नारायण नारायण
अस्त्र वीणा
माता-पिता
  • ब्रह्मा (Father)
  • सरस्वती (Mother)
भाई-बहन सनकादि ऋषि तथा दक्ष प्रजापति
सवारी बादल (मायावी बादल जो बोल सुन सकता है)

नारद जयंती का महत्व / Significance of Narada Jayanti

  • हिन्‍दू धार्मिक शास्‍त्रों के अनुसार नारद मुनि भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने जाते हैं।
  • ऐसी मान्यता है कि इस दिन नारद जी की पूजा-अर्चना करने से भक्‍तों को बल, बुद्धि एवं सात्विक शक्ति की प्राप्ति होती है।
  • एक और पौराणिक मान्‍यता यह भी है कि नारद मुनि ना केवल देवताओं, बल्कि असुरों के बीच भी आदरणीय माने गए थे।
  • ऐसा कहा जाता है कि नारद मुनि दुनिया के पहले पत्रकार माने गए थे और वह सबके बीच सम्मानित हैं।
  • नारद जयंती के पर्व पर व्रत करने से भक्‍तों की मनोकामनाएं शीघ्र ही पूर्ण होती हैं।
  • नारद जयंती के अवसर पर नारद मुनि जी की भक्ति भाव से पूजा-आराधना करने पर नारद जी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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