प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book PDF

प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book PDF Download

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प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book PDF Details
प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book
PDF Name प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book PDF
No. of Pages 34
PDF Size 1.67 MB
Language English
CategoryEnglish
Source pdfsource.org
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प्रदोष व्रत की कथा और विधि | Pradosh Vrat Katha Book

नमस्कार पाठकों, इस लेख के माध्यम से आप प्रदोष व्रत की कथा और विधि PDF / Pradosh Vrat Katha PDF प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों में प्रदोष व्रत को अत्यधिक प्रभावशाली एवं फलदायी माना जाता है। यदि आप भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं तथा उनके साथ – साथ देवी पार्वती माता का भी आशीर्वाद ग्रहण करना चाहते हैं तो प्रदोष व्रत का पालन अवश्य करें।

यदि आपके जीवन में चारों ओर से संकट आ रहे हैं तथा आपको शत्रुओं ने बहुत अधिक परेशान कर रखा हो अथवा आपकी कोई विशेष मनोकामना हो तो आपको प्रदोष व्रत पूर्ण विधि – विधान से करना चाहिए। प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की त्रियोदशी तिथि को किया जाता है तथा इस तिथि के दिन अथवा वार के अनुरूप ही इसके विभिन्न लाभ होते हैं।

प्रदोष व्रत की कथा और विधि PDF / Pradosh Vrat Katha Book PDF

स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था।

उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया। कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी।

ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया। एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त “अंशुमती” नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

प्रदोष व्रत कथा पूजा विधि / Pradosh Vrat Katha Pooja Vidhi

  • इस दिन सुबह जल्दी उठ जाएं और स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान शिव का अभिषेक करें।
  • उन्हें उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग लगाएं।
  • व्रत रखने वाले लोग इस दिन फलाहार ग्रहण करते हैं।
  • प्रदोष व्रत की पूजा शाम को प्रदोष काल यानी की गोधूली बेला में करना उचित माना गया है।
  • प्रदोष की पूजा करते समय साधक को भगवान शिव के मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का पाठ करना चाहिए।
  • इसके बाद शिवलिंग पर दूध, जल और बेलपत्र चढ़ाना चाहिए।
  • इस दिन शिव चालीसा पढ़ना भी उत्तम माना गया है।
  • विधि विधान पूजा के बाद शिव आरती करें और प्रसाद सभी में बांटकर खुद भी ग्रहण कर लें।

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