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पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha Hindi PDF Download

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पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha PDF Details
पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha
PDF Name पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha PDF
No. of Pages 4
PDF Size 0.49 MB MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdfseva.com
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पूर्णिमा व्रत कथा | Purnima Vrat Katha Hindi

नमस्कार प्रिय मित्रो इस लेख के माध्यम से आज हम आपको पूर्णिमा व्रत कथा PDF / Purnima Vrat Katha PDF in Hindi के बारे में जानकारी दे रहे है। ऐसा माना जाता है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, माघ महीने में सभी देवी-देवता पृथ्वी पर मनुष्य रूप में प्रकट होते है प्रयागराज में स्नान, दान और तप करते हैं। कहते हैं कि इस दिन प्रयागराज में स्नान करने से मनुष्य की प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है।

मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। इस दिन लोग व्रत भी करते है। इस दिन व्रत रखने से मनुष्य के जीवन में आये कष्ट दूर हो जाते है। ईश्वर उनकी मनोकामना पूर्ण करते है। हिन्दू पंचांग कैलेंडर के अनुसार16 फरवरी, बुधवार को माघ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। इस दिन पूर्णिमा व्रत रखा जाएगा। पूर्णिमा तिथि 15 फरवरी 2022 को रात 09 बजकर 42 मिनट से प्रारंभ हो गयी है जो कि 16 फरवरी को रात 01 बजकर 25 मिनट तक रहेगी।

माघ पूर्णिमा के दिन भक्त सुबह उठकर गंगा स्नान करें और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी के साथ वाली तस्वीर या प्रतिमा रखें फिर विधि विधान से पूजन करें। पूजा के समय ईश्वर को पुष्प, फल, मिठाई, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद माघ पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के बाद सूर्य के सन्मुख खड़े होकर जल में तिल डालकर उसका तर्पण करें। पुरे दिन में व्रत रखकर भगवान को सच्चे मन से याद करें। रात्रि में चंद्र दर्शन करके चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद अपना व्रत खोलें। पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा भी अवश्य पढ़े।

पूर्णिमा व्रत कथा PDF / Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

द्वापर युग में एक समय की बात है कि यशोदा जी ने कृष्ण से कहा – हे कृष्ण! तुम सारे संसार के उत्पन्नकर्ता, पोषक तथा उसके संहारकर्ता हो, आज कोई ऐसा व्रत मुझसे कहो, जिसके करने से मृत्युलोक में स्त्रियों को विधवा होने का भय न रहे तथा यह व्रत सभी मनुष्यों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला हो।

श्रीकृष्ण कहने लगे – हे माता! तुमने अति सुन्दर प्रश्न किया है। मैं तुमसे ऐसे ही व्रत को सविस्तार कहता हूँ । सौभाग्य की प्राप्ति के लिए स्त्रियों को बत्तीस पूर्णमासियों का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के करने से स्त्रियों को सौभाग्य सम्पत्ति मिलती है। यह व्रत अचल सौभाग्य देने वाला एवं भगवान् शिव के प्रति मनुष्य-मात्र की भक्ति को बढ़ाने वाला है। यशोदा जी कहने लगीं – हे कृष्ण! सर्वप्रथम इस व्रत को मृत्युलोक में किसने किया था। इसके विषय में विस्तारपूर्वक मुझे बताओ।

श्रीकृष्ण जी कहने लगे कि इस भूमण्डल पर एक अत्यन्त प्रसिद्ध राजा चन्द्रहास से पालित अनेक प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण ‘कातिका’ नाम की एक नगरी थी। वहां पर धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण रहता था और उसकी स्त्री अति सुशीला रूपवती थी। दोनों ही उस नगरी में बड़े प्रेम के साथ रहते थे।

घर में धन-धान्य आदि की कोई कमी नहीं थी। परन्तु उनको एक बड़ा दुख था कि उनके कोई सन्तान नहीं थी। इस दुख से वह अत्यन्त दुखी रहते थे। एक समय एक बड़ा तपस्वी ऋषि उस नगरी में आया। वह ऋषि उस ब्राह्मण के घर को छोड़कर अन्य सब घरों से भिक्षा लाकर भोजन किया करता था।

रूपवती से वह भिक्षा नहीं लिया करता था। उस योगी ने एक दिन रूपवती से भिक्षा न लेकर किसी अन्य घर से भिक्षा लेकर गंगा किनारे जाकर, भिक्षान्न को प्रेमपूर्वक खा रहा था कि धनेश्वर ने योगी का यह सब कार्य किसी प्रकार से देख लिया।

माघ पूर्णिमा व्रत कथा PDF / Magh Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

कथा के अनुसार कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का ब्राह्मण निवास करता था। वह अपना जीवन निर्वाह दान पर करता था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी के कोई संतान नही थी। एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, लेकिन सभी ने उसे बांझ कहकर भिक्षा देने से इनकार कर दिया। तब किसी ने उससे 16 दिन तक मां काली की पूजा करने को कहा।

उसके कहे अनुसार ब्राह्मण दंपत्ति ने ऐसा ही किया। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर 16 दिन बाद मां काली प्रकट हुई। मां काली ने ब्राह्मण की पत्नी को गर्भवती होने का वरदान दिया और कहा कि अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम दीपक जलाओ। इस तरह हर पूर्णिमा के दिन तक दीपक बढ़ाती जाना जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं।

ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से आम का कच्चा फल तोड़कर दिया। उसकी पत्नी ने पूजा की और फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई। प्रत्येक पूर्णिमा को वह मां काली के कहे अनुसार दीपक जलाती रही। मां काली की कृपा से उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदास रखा।

देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में उन दोनों के साथ एक दुर्घटना घटी जिसके कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया। देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है परंतु फिर भी जबरन उसका विवाह करवा दिया गया। कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था, इसलिए काल उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया।

इस कथा के अनुसार सच्चे मन से पूर्णिमा के दिन व्रत करने से संकट से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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