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पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha Hindi PDF Download

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पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha PDF Details
पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha
PDF Name पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha PDF
No. of Pages 4
PDF Size 0.49 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
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पूर्णिमा व्रत कथा PDF | Purnima Vrat Katha Hindi

In this article, we are going to share पूर्णिमा व्रत कथा PDF / Purnima Vrat Katha PDF in Hindi language with you. This day is considered very auspicious from a spiritual point of view. Goddess Mahalakshmi is worshipped on this day. It is believed that worshipping Goddess Lakshmi on this day brings wealth and food to the house.

It is said that eating kheer in the light of the moon on this day brings health. It is believed that nectar showers from the sky. Many people observe a fast on this day considering it important.

माघ पूर्णिमा के दिन भक्त सुबह उठकर गंगा स्नान करें और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी के साथ वाली तस्वीर या प्रतिमा रखें फिर विधि विधान से पूजन करें। पूजा के समय ईश्वर को पुष्प, फल, मिठाई, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद माघ पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के बाद सूर्य के सन्मुख खड़े होकर जल में तिल डालकर उसका तर्पण करें।

पूर्णिमा व्रत कथा PDF / Purnima Vrat Katha PDF in Hindi

द्वापर युग में एक समय की बात है कि यशोदा जी ने कृष्ण से कहा – हे कृष्ण! तुम सारे संसार के उत्पन्नकर्ता, पोषक तथा उसके संहारकर्ता हो, आज कोई ऐसा व्रत मुझसे कहो, जिसके करने से मृत्युलोक में स्त्रियों को विधवा होने का भय न रहे तथा यह व्रत सभी मनुष्यों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला हो।

श्रीकृष्ण कहने लगे – हे माता! तुमने अति सुन्दर प्रश्न किया है। मैं तुमसे ऐसे ही व्रत को सविस्तार कहता हूँ । सौभाग्य की प्राप्ति के लिए स्त्रियों को बत्तीस पूर्णमासियों का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के करने से स्त्रियों को सौभाग्य सम्पत्ति मिलती है। यह व्रत अचल सौभाग्य देने वाला एवं भगवान् शिव के प्रति मनुष्य-मात्र की भक्ति को बढ़ाने वाला है। यशोदा जी कहने लगीं – हे कृष्ण! सर्वप्रथम इस व्रत को मृत्युलोक में किसने किया था, इसके विषय में विस्तारपूर्वक मुझसे कहो।

श्रीकृष्ण जी कहने लगे कि इस भूमण्डल पर एक अत्यन्त प्रसिद्ध राजा चन्द्रहास से पालित अनेक प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण ‘कातिका’ नाम की एक नगरी थी। वहां पर धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण था और उसकी स्त्री अति सुशीला रूपवती थी। दोनों ही उस नगरी में बड़े प्रेम के साथ रहते थे। घर में धन-धान्य आदि की कमी नहीं थी।

उनको एक बड़ा दुख था कि उनके कोई सन्तान नहीं थी, इस दुख से वह अत्यन्त दुखी रहते थे। एक समय एक बड़ा तपस्वी योगी उस नगरी में आया। वह योगी उस ब्राह्मण के घर को छोड़कर अन्य सब घरों से भिक्षा लाकर भोजन किया करता था। रूपवती से वह भिक्षा नहीं लिया करता था। उस योगी ने एक दिन रूपवती से भिक्षा न लेकर किसी अन्य घर से भिक्षा लेकर गंगा किनारे जाकर, भिक्षान्न को प्रेमपूर्वक खा रहा था कि धनेश्वर ने योगी का यह सब कार्य किसी प्रकार से देख लिया।

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