संतोषी माता की व्रत कथा और आरती PDF

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संतोषी माता की व्रत कथा और आरती
PDF Name संतोषी माता की व्रत कथा और आरती PDF
No. of Pages 8
PDF Size 0.95 MB
Language English
CategoryEnglish
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संतोषी माता की व्रत कथा और आरती

नमस्कार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए संतोषी माता की व्रत कथा और आरती PDF प्रदान करने जा रहे हैं। हिन्दू धर्म में संतोषी माता का बहुत अधिक महत्व माना जाता हैं। संतोषी माता एक बहुत ही चमत्कारी एवं दयालु माता है। संतोषी माता भगवान श्री गणेश जी की पुत्री हैं। संतोषी माता का व्रत करने से व्यक्ति को धन, सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है।

संतोषी माता का व्रत शुक्रवार के दिन किया जाता है क्योंकि शुक्रवार का दिन माता संतोषी को समर्पित है। शुक्रवार के दिन व्रत करने वाले भक्त को खटाई का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि संतोषी माता के व्रत में खटाई का सेवन निषेध माना जाता है। इसीलिए शुक्रवार का व्रत करने वाले भक्तों द्वारा माता को भी खटाई का प्रसाद करना निषेध माना गया है। इस चमत्कारी व्रत को करने वाले भक्त पर संतोषी माता जी की विशेष कृपा होती है।

जिससे उनके सभी प्रकार के दुख एवं कष्ट तत्काल ही दूर हो जाते हैं। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति बहुत समय से किसी भी प्रकार के गृह क्लेश या आर्थिक समस्या से ग्रसित है तो संतोषी माता के व्रत का पालन प्रत्येक शुक्रवार को श्रद्धापूर्वक अवश्य करें। वरट में संतोषी माता की व्रत कथा और आरती दोनों का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए। इस व्रत को करने से हर प्रकार के दुख एवं परेशानी से शीघ्र ही छुटकारा मिलता है।

संतोषी माता की व्रत कथा और आरती PDF / Santoshi Mata Vrat Katha PDF

  • एक बुढ़िया थी और उसका एक ही पुत्र था। बुढ़िया पुत्र के विवाह के पश्चात बहू से घर के सारे काम करवाती थी लेकिन उसे ठीक से खाना नहीं देती थी। यह सब लड़का देखता पर माँ से कुछ भी कह नहीं पाता था। काफी सोच-विचारकर एक दिन लड़का माँ से बोला- माँ, मैं परदेस जा रहा हूं। माँ ने बेटे जाने की आज्ञा दे दी।
  • इसके बाद वह अपनी पत्नी के पास जाकर बोला- मैं परदेस जा रहा हूं, अपनी कुछ निशानी दे दे। बहू बोली- मेरे पास तो निशानी देने योग्य कुछ भी नहीं है। यह कहकर वह पति के चरणों में गिरकर रोने लगी। इससे पति के जूतों पर उसके गोबर से सने हाथों से छाप बन गई।
  • पुत्र के जाने बाद सास के अत्याचार और बढ़ते गए। एक दिन बहू दु:खी हो मंदिर चली गई, वहां बहुत-सी स्त्रियां पूजा कर रही थीं।
  • उसने स्त्रियों से व्रत के बारे में जानकारी ली तो वे बोलीं कि हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। इससे सभी प्रकार के कष्टों का नाश होता है।
  • स्त्रियों ने बताया- शुक्रवार को नहा-धोकर एक लोटे में शुद्ध जल ले गुड़-चने का प्रसाद लेना तथा सच्चे मन से माँ का पूजन करना चाहिए। खटाई भूल कर भी मत खाना और न ही किसी को देना। एक वक्त भोजन करना, व्रत विधान सुनकर अब वह प्रति शुक्रवार को संयम से व्रत करने लगी।
  • माता की कृपा से कुछ दिनों के बाद पति का पत्र आया, कुछ दिनों बाद पैसा भी आ गया। उसने प्रसन्न मन से फिर व्रत किया तथा मंदिर में जा अन्य स्त्रियों से बोली- संतोषी माँ की कृपा से हमें पति का पत्र तथा रुपया आया है।´ अन्य सभी स्त्रियां भी श्रद्धा से व्रत करने लगीं।
  • बहू ने कहा- हे माँ! जब मेरा पति घर आ जाएगा तो मैं तुम्हारे व्रत का उद्यापन करूंगी। अब एक रात संतोषी मां ने उसके पति को स्वप्न दिया और कहा कि तुम अपने घर क्यों नहीं जाते? तो वह कहने लगा- सेठ का सारा सामान अभी बिका नहीं। रुपया भी अभी नहीं आया है।
  • उसने सेठ को स्वप्न की सारी बात कही तथा घर जाने की इजाजत मांगी, पर सेठ ने इनकार कर दिया। माँ की कृपा से कई व्यापारी आए, सोना-चांदी तथा अन्य सामान खरीदकर ले गए। कर्जदार भी रुपया लौटा गए, अब तो साहूकार ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी।
  • घर आकर पुत्र ने अपनी माँ व पत्नी को बहुत सारे रुपये दिए। पत्नी ने कहा कि मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है। उसने सभी को न्योता दे उद्यापन की सारी तैयारी की, पड़ोस की एक स्त्री उसे सुखी देख ईर्ष्या करने लगी थी। उसने अपने बच्चों को सिखा दिया कि तुम भोजन के समय खटाई जरूर मांगना।
  • उद्यापन के समय खाना खाते-खाते बच्चे खटाई के लिए मचल उठे, तो बहू ने पैसा देकर उन्हें बहलाया। बच्चे दुकान से उन पैसों की इमली-खटाई खरीदकर खाने लगे। तो बहू पर माता ने कोप किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़कर ले जाने लगे। तो किसी ने बताया कि उद्यापन में बच्चों ने पैसों की इमली खटाई खाई है तो बहू ने पुन: व्रत के उद्यापन का संकल्प किया।
  • संकल्प के बाद वह मंदिर से निकली तो राह में पति आता दिखाई दिया। पति बोला- इतना धन जो कमाया है, उसका टैक्स राजा ने मांगा था। अगले शुक्रवार को उसने फिर विधिवत व्रत का उद्यापन किया। इससे संतोषी माँ प्रसन्न हुईं। नौमाह बाद चांद-सा सुंदर पुत्र हुआ। अब सास, बहू तथा बेटा माँ की कृपा से आनंद से रहने लगे।

संतोषी माता व्रत पूजा विधि / Santoshi Mata Vrat Puja Vidhi in Hindi

  • सुख-सौभाग्य की कामना हेतु माता संतोषी के 16 शुक्रवार तक व्रत किए जाने का विधान विशेष रूप से माना गया है।
  • संतोषी माता का व्रत करने वाले भक्त को शुक्रवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफ़ाई इत्यादि कर लेनी चाहिए।
  • सफाई के बाद स्नानादि आदि करके शुद्ध हो जाएँ।
  • तत्पश्चात घर में किसी पवित्र जगह पर संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर लें।
  • तदोपरांत संतोषी माता के सम्मुख एक कलश में जल भर कर रखें।
  • इसके बाद कलश के ऊपर एक कटोरे में भर कर गुड़ व चना का प्रसाद रख लें।
  • अब माता के सामने एक घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • तत्पश्चात माता को अक्षत, फ़ूल, सुगन्धित गंध, नारियल, लाल वस्त्र अथवा चुनरी अर्पित करें।
  • इसके बाद माता संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ।
  • अंत में संतोषी माता की जय बोलकर माता की कथा आरम्भ करें।

संतोषी माता की आरती PDF / Santoshi Mata Aarti PDF

जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता।

अपने सेवक जन की सुख सम्पति दाता ।।

जय सन्तोषी माता….

सुन्दर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हो।

हीरा पन्ना दमके तन श्रृंगार लीन्हो ।।

जय सन्तोषी माता….

गेरू लाल छटा छबि बदन कमल सोहे।

मंद हंसत करुणामयी त्रिभुवन जन मोहे ।।

जय सन्तोषी माता….

स्वर्ण सिंहासन बैठी चंवर दुरे प्यारे।

धूप, दीप, मधु, मेवा, भोज धरे न्यारे।।

जय सन्तोषी माता….

गुड़ अरु चना परम प्रिय ता में संतोष कियो।

संतोषी कहलाई भक्तन वैभव दियो।।

जय सन्तोषी माता….

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही।

भक्त मंडली छाई कथा सुनत मोही।।

जय सन्तोषी माता….

मंदिर जग मग ज्योति मंगल ध्वनि छाई।

बिनय करें हम सेवक चरनन सिर नाई।।

जय सन्तोषी माता….

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै।

जो मन बसे हमारे इच्छित फल दीजै।।

जय सन्तोषी माता….

दुखी दारिद्री रोगी संकट मुक्त किए।

बहु धन धान्य भरे घर सुख सौभाग्य दिए।।

जय सन्तोषी माता….

ध्यान धरे जो तेरा वांछित फल पायो।

पूजा कथा श्रवण कर घर आनन्द आयो।।

जय सन्तोषी माता….

चरण गहे की लज्जा रखियो जगदम्बे।

संकट तू ही निवारे दयामयी अम्बे।।

जय सन्तोषी माता….

सन्तोषी माता की आरती जो कोई जन गावे।

रिद्धि सिद्धि सुख सम्पति जी भर के पावे।।

जय सन्तोषी माता….

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