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शनि अष्टक | Shani Ashtakam PDF

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शनि अष्टक | Shani Ashtakam
PDF Name शनि अष्टक | Shani Ashtakam PDF
No. of Pages 4
PDF Size 0.52 MB
Language English
CategoryEnglish
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शनि अष्टक | Shani Ashtakam

शनि देव को न्यायप्रिय देवता माना जाता है। वह सबके साथ न्याय करते हैं और उनके कर्मो के अनुसार उन्हें उनका परिणाम देते हैं।
शनि देव का प्रिय दिन शनिवार है। इसीलिए शनिवार को शनि देव की विशेष पूजा की जाती है। शनि देव की पूजा करने से शनि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

अगर कोई व्यक्ति शनि देव से सम्बन्धित समस्याओं से बहुत अधिक समय से पीड़ित हैं, तो आपके लिए एक अचूक उपाय है – शनि अष्टक। शनि अष्टक का पाठ करने से मनुष्य के जीवन के सारे कष्ट पल में मिट जाते हैं। शनि अष्टक एक बहुत ही अच्छा उपाय हैं शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए। इसीलिए अगर आप भी शनि देव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो शनि अष्टक का नियमित रूप से पाठ करें।

भक्तजनों को श्रद्धापूर्वक शनि अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करना चाहिए ताकि शनिदेव की कृपा उनपर हमेशा बनी रहे जो भी भक्त शनिदेव का व्रत रखते है उन्हें शनि देव व्रत कथा सुनने के पश्चात ही व्रत खोलना चाहिए। भक्तजनों को शनिदेव मन्त्रों  उच्चारण कर के शनि आरती  भी अवश्य करनी चाहिए। शनि अष्टक का निर्मल भाव से गायन करने से शनिदेव अतिप्रशन्न होते हैं और अपने भक्तों को मन चाहा वर देते हैं। शनिदेव द्वारा नरसिंह स्तुति का पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी होता है।

Shani Ashtakam PDF

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।1

 

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते। 2

 

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते। 3

 

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने। 4

 

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च। 5

 

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते। 6

 

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:। 7

 

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्। 8

 

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:। 9

 

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।10

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