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शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam PDF in Hindi

शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam Hindi PDF Download

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शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam PDF Details
शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam
PDF Name शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam PDF
No. of Pages 2
PDF Size 0.06 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
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शिव रुद्राष्टकम | Shiv Rudrashtakam Hindi

श्री रुद्राष्टकम् स्तोत्र का उल्लेख श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है कि भगवान श्री रामचंद्र ने त्रिलोक विजेता रावण से युद्ध करने से पहले रामेशवरम् में इस चमत्कारी रुद्राष्टकम् स्तुति को गा कर भगवान शिव की उपासना की थी। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास द्वारा की गई है। इस स्तोत्र में भगवान शिव की बहुत ही सुन्दर स्तुति की गई है।

भगवान शिव बहुत ही भोले हैं और वे अपने भक्तों की प्रार्थना से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसी कारण उन्हें ‘आशुतोष’ भी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों में भोलेनाथ को समर्पित कई स्तुतियां रचित हैं परन्तु श्री रामचरितमानस में रचित ‘रुद्राष्टकम’ अपने-आप में ही अद्भुत है। यह एक बहुत ही मधुर स्तुति है। यही कारण है कि शिव के साधक पूजा के समय सस्वर इसका पाठ करते हैं।

मान्यता है कि भगवान शिव को खुश करने के लिए सोमवार को सुबह उठकर स्नान करके भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए क्योंकि सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। ऐसे में कहा जाता है कि अगर सोमवार को भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा और रुद्राष्टकम् स्तोत्र का मन से पाठ किया जाए तो सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाती है और सभी मनोकामना पूरी होती हैं।

भक्तजनों को ॐ जय शिव ओमकारा आरती का गायन भी करना चाहिए वैसे भी यह भक्तों की प्रिय आरती है। जो भी शिव जी के बड़े भक्त हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखते है उन्हें इस दिन  विधि अनुसार महा शिवरात्रि अभिषेक भी करना चाहिए। शिव सूत्र ऐसे ग्रंथ माने जाते हैं जो आध्यात्मिकता के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। शिव सहस्रनाम स्तोत्र हिंदू परंपरा में एक प्रकार का भक्तिपूर्ण भजन है जिसमें एक देवता के कई नाम सूचीबद्ध हैं। भोलेनाथ जी की पूजा-अर्चना कर के शिव जी आरती अवश्य करनी चाहिए तभी पूजा सफल होती है। श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र बहुत ही प्रभावशाली मंत्र है जिससे भोलेनाथ बहुत प्रशन्न होते हैं। रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र  एक ऐसा स्तोत्र है जो शिव जी को प्रशन्न करने के लिए रावण द्वारा गाया गया था।इसीलिए जो भी भक्त शिव जी को प्रशन्न करना चाहते हैं वो इसी स्तोत्र का गायन करते हैं। जो  भी भक्त श्री शिवरामाष्टक स्तोत्रम् का लगातार 11 बार पाठ करते हैं, भोलेनाथ उनकी बुद्धि एवं ज्ञान में विशेष वृद्धि करते हैं।

 

शिव रुद्राष्टकम हिंदी में | Shiv Rudrashtakam Lyrics in Hindi PDF

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ।।

हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी ! मैं आपको नमस्कार करता  हूँ ।  निजस्वरूप  में  स्थित  (अर्थात्  मायादिरहित), (मायिक),  गुणों  से  रहित,  भेदरहित,  इच्छारहित,  चेतन, आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप में धारण करनेवाले दिगंबर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करनेवाले) आपको मैं भजता हूँ ।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ।।
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ।।

निराकार, ओंकार (प्रणव) के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इंद्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल (अर्थात् महामृत्युंजय) कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ ।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ।।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ।।

जो हिमालय के सदृश गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की कांति एवं छटा है, जिनके सिर के जटाजूट पर सुंदर तरंगों से युक्त गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का बालचंद्र और कंठ में सर्प सुशोभित है ।

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ।।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ।।

जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ और दयालु हैं, सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके स्वामी श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ ।

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ।।

प्रचण्ड (बल-तेज-वीर्य से युक्त), सबमें श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले, (दैहिक, दैविक, भौतिक आदि) तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करनेवाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए, (भक्तों को) भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानी-पति श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ ।

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।।
चिदानंद संदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ।।

कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करनेवाले,  सज्जनों  के  सदा  आनंददाता,  त्रिपुर  के  शत्रु सच्चिदानंदघन, मोह को हरनेवाले, मन को मथ डालनेवाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो ! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए ।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ।।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ।।

हे उमापति ! जब तक आपके चरणकमलों को (मनुष्य) नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके संतापों का नाश होता है । अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करनेवाले प्रभो ! प्रसन्न होइए ।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ।।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ।।

मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही । मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ । हे प्रभो ! बुढ़ापा तथा जन्म (मरण) के दुःखसमूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दुःख से रक्षा कीजिये । हे ईश्वर ! हे शंभो ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ।।

भगवान रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजीकी तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मणद्वारा कहा गया । जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं ।

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