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शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram PDF in Hindi

शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram Hindi PDF Download

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शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram PDF Details
शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram
PDF Name शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram PDF
No. of Pages 4
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Language Hindi
CategoryEnglish
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शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित | Shiv Tandav Stotram Hindi

Dear readers, if you are searching for Shiv Tandav Stotram PDF and you are unable to find it anywhere then don’t worry you are on the right page. शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्त को मनचाहा वरदान भी देते हैं। इस स्तोत्र के जाप से रावण ने शिव को प्रसन्न किया था। इसका निरंतर जाप करने से भगवान शिव अपने भक्त के सभी दुखों को दूर करते हैं और उसे शांतिपूर्ण जीवन जीने का वरदान देते हैं। इस पोस्ट में हमने शिव तांडव स्तोत्र के बारे में बताया है और साथ ही यह भी बताया है कि इसका पाठ कैसे किया जाता है। शिव तांडव स्तोत्र की रचना शिव के परम भक्त रावण ने की है। यहां से आप आसानी से शिव तांडव स्तोत्र हिंदी पीडीएफ / शिव तांडव स्तोत्र पीडीएफ हिंदी में अर्थ सहित डाउनलोड कर सकते हैं। 

जो भी भक्त रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करते हैं उनसे भोलेनाथ बहुत प्रशन्न होते है। श्री शिवरामाष्टक स्तोत्रम् स्तोत्र का लगातार 11 बार पाठ करने से व्यक्ति की बुद्धि एवं ज्ञान में विशेष वृद्धि होती है। भक्तजनों को ॐ जय शिव ओमकारा आरती का गायन भी करना चाहिए वैसे भी यह भक्तों की प्रिय आरती है। जो भी शिव जी के बड़े भक्त हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखते है उन्हें इस दिन  विधि अनुसार महा शिवरात्रि अभिषेक भी करना चाहिए। शिव सूत्र ऐसे ग्रंथ हैं जो आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधक को आत्म की ओर आंतरिक यात्रा शुरू करने में मदद करते हैं। शिव सहस्रनाम स्तोत्र हिंदू परंपरा में एक प्रकार का भक्तिपूर्ण भजन है जिसमें एक देवता के कई नाम सूचीबद्ध हैं। भोलेनाथ जी की पूजा-अर्चना कर के शिव जी आरती अवश्य करनी चाहिए तभी पूजा सफल होती है।

शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित PDF | Shiv Tandav Stotram PDF in Hindi

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥

अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्॥१५॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम्॥१६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥१७॥

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