श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan PDF in Hindi

श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan Hindi PDF Download

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श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan PDF Details
श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan
PDF Name श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan PDF
No. of Pages 10
PDF Size 0.98 MB
Language Hindi
CategoryReligion & Spirituality
Source pdffile.co.in
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श्री बजरंग बाण | Shri Bajrang Baan Hindi

नमस्कार मित्रों, इस लेख के माध्यम से हम आप सभी को श्री बजरंग बाण PDF / Shri Bajrang Baan PDF in Hindi प्रदान करने जा रहे हैं हैं। यह बजरंग बाण PDF एक अत्यधिक प्रभावशाली काव्य रचना है जिसका पाठ करने से व्यक्ति को शीघ्र ही प्रभु श्री राम जी के अनन्य भक्त हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। क्योंकि यह दिव्य बजरंग बाण PDF श्री हनुमान जी को समर्पित है।

हनुमान जी को विभिन्न प्रकार के चमत्कारी नामों में से जाना जाता है जिनमें से एक नाम बजरंगबली भी है। इसीलिए यह भी माना जाता है कि यह दिव्य काव्य बजरंगबली के बाण की भांति तीव्र एवं अति प्रभावशाली होता है। इसीलिए इस काव्य को बजरंग बाण के नाम से जाना जाता है। तो भक्तों यदि आप हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो सम्पूर्ण बजरंग बाण का नियमित रूप से पाठ अवश्य करें।

बजरंग बाण डाउनलोड PDF / Bajrang Baan PDF in Red Colour

॥ दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीति ते,बिनय करै सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करै हनुमान॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमन्त सन्त हितकारी।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥

जन के काज विलम्ब न कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा।सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुर लोका॥

जाय विभीषण को सुख दीन्हा।सीता निरखि परम पद लीन्हा॥

बाग उजारि सिन्धु महं बोरा।अति आतुर यम कातर तोरा॥

अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेटि लंक को जारा॥

लाह समान लंक जरि गई।जय जय धुनि सुर पुर महं भई॥

अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।कृपा करहुं उर अन्तर्यामी॥

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता।आतुर होइ दु:ख करहुं निपाता॥

जय गिरिधर जय जय सुख सागर।सुर समूह समरथ भटनागर॥

ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।बैरिहिं मारू बज्र की कीले॥

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो।महाराज प्रभु दास उबारो॥

ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो।बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥

सत्य होउ हरि शपथ पायके।रामदूत धरु मारु धाय के॥

जय जय जय हनुमन्त अगाधा।दु:ख पावत जन केहि अपराधा॥

पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं।तुमरे बल हम डरपत नाहीं॥

पाय परौं कर जोरि मनावों।यह अवसर अब केहि गोहरावों॥

जय अंजनि कुमार बलवन्ता।शंकर सुवन धीर हनुमन्ता॥

बदन कराल काल कुल घालक।राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

भूत प्रेत पिशाच निशाचर।अग्नि बैताल काल मारीमर॥

इन्हें मारु तोहि शपथ राम की।राखु नाथ मरजाद नाम की॥

जनकसुता हरि दास कहावो।ताकी शपथ विलम्ब न लावो॥

जय जय जय धुनि होत अकाशा।सुमिरत होत दुसह दु:ख नाशा॥

चरण शरण करि जोरि मनावों।यहि अवसर अब केहि गोहरावों॥

उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई।पांय परौं कर जोरि मनाई॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥

ॐ हं हं हांक देत कपि चञ्चल।ॐ सं सं सहम पराने खल दल॥

अपने जन को तुरत उबारो।सुमिरत होय आनन्द हमारो॥

यहि बजरंग बाण जेहि मारो।ताहि कहो फिर कौन उबारो॥

पाठ करै बजरंग बाण की।हनुमत रक्षा करै प्राण की॥

यह बजरंग बाण जो जापै।तेहि ते भूत प्रेत सब कांपे॥

धूप देय अरु जपै हमेशा।ताके तन नहिं रहे कलेशा॥

॥ दोहा ॥

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै,सदा धरै उर ध्यान।

तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करै हनुमान॥

श्री हनुमंत स्तुति / Shri Hanuman Stuti

मनोजवं मारुत तुल्यवेगं,

जितेन्द्रियं, बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥

वातात्मजं वानरयुथ मुख्यं,

श्रीरामदुतं शरणम प्रपद्धे ॥

श्री हनुमान आरती / Shri Hanuman Aarti Lyrics in Hindi

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥

जाके बल से गिरवर काँपे ।

रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई ।

संतन के प्रभु सदा सहाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ॥

दे वीरा रघुनाथ पठाए ।

लंका जारि सिया सुधि लाये ॥

लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।

जात पवनसुत बार न लाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ॥

लंका जारि असुर संहारे ।

सियाराम जी के काज सँवारे ॥

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।

लाये संजिवन प्राण उबारे ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ॥

पैठि पताल तोरि जमकारे ।

अहिरावण की भुजा उखारे ॥

बाईं भुजा असुर दल मारे ।

दाहिने भुजा संतजन तारे ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ॥

सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें ।

जय जय जय हनुमान उचारें ॥

कंचन थार कपूर लौ छाई ।

आरती करत अंजना माई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ॥

जो हनुमानजी की आरती गावे ।

बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥

लंक विध्वंस किये रघुराई ।

तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥

॥ इति संपूर्णंम् ॥

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