ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर निबंध PDF

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ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर निबंध
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No. of Pages 22
PDF Size 0.41 MB
Language English
CategoryEducation & Jobs
Source pdffile.co.in
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ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर निबंध

नमस्कार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर निबंध PDF / Urja Ke Vaikalpik Srot Par Nibandh PDF प्रदान करने जा रहे हैं। प्राकृतिक ऊर्जा के अतिरिक्त जितने भी स्रोत हैं, उन्हें वैकल्पिक स्रोत कहते हैं। इस पोस्ट के द्वारा आप ऊर्जा के स्रोतों के बारे में भली-भांति जान पाएंगे जो कि आपके दैनिक जीवन में ही नहीं अपितु शिक्षा के क्षेत्र में भी आपके लिये अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

जैसा कि आप सभी को पता ही होगा कि आज के समय में ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी ऊर्जा की माँग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, क्योंकि मानव इस समय इसके उपयोग कम एवं दुरुपयोग अधिक कर रहा है। 75 प्रतिशत ऊर्जा की खपत खाना बनाने और प्रकाश करने हेतु, उपयोग में लाया जा रहा है। इस विषय पर और अधिक जानने के लिए आप इस लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ें।

ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पर निबंध PDF / Urja Ke Vaikalpik Srot Par Ek Nibandh Likhiye

अक्षय ऊर्जा प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत सौर, पवन, सागर, पनबिजली, बायोमास, भूतापीय संसाधनों और जैव ईंधन और हाइड्रोजन से लगातार अंतरनिहित प्राप्त होती रहती है।

सौर ऊर्जा

सूर्य ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है। यह दिन में हमारे घरों में रोशनी प्रदान करता है कपड़े और कृषि उत्पादों को सुखाता है हमें गर्म रखता है इसकी क्षमता इसके आकार से बहुत अधिक है।

लाभ

  • यह एक बारहमासी, प्राकृतिक स्रोत और मुफ्त है।
  • यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
  • यह प्रदूषण रहित है।

हानियां

  • मौसम में परिवर्तन आश्रित – इसलिए इनका हमेशा प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
  • उत्पादक को बहुत अधिक प्रारंभिक निवेश करने की आवश्यकता होती है।

सौर ऊर्जा के उत्पादक उपयोग हेतु प्रौद्योगिकी

सौर्य ऊर्जा का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है। सोलर फोटोवोल्टेइक सेल के माध्यम से सौर विकिरण सीधे डीसी करेन्ट में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार, उत्पादित बिजली का उसी रूप में इस्तेमाल किया जा सकता या उसे बैटरी में स्टोर/जमा कर रखा जा सकता है।

संग्रह किये गये सौर ऊर्जा का उपयोग रात में या वैसे समय किया जा सकता जब सौर्य ऊर्जा उपलब्ध नहीं हो। आजकल सोलर फोटोवोल्टेइक सेल का, गाँवों में घरों में प्रकाश कार्य, सड़कों पर रोशनी एवं पानी निकालने के कार्य में सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में सौर ऊर्जा का उपयोग पानी गर्म करने में भी किया जा रहा है।

पवन ऊर्जा

पवन स्थल या समुद्र में बहने वाली हवा की एक गति है। पवन चक्की के ब्लेड जिससे जुड़े होते है उनके घुमाने से पवन चक्की घुमने लगती है जिससे पवन ऊर्जा उत्पन्न होती है । शाफ्ट का यह घुमाव पंप या जनरेटर के माध्यम से होता है तो बिजली उत्पन्न होती है। यह अनुमान है कि भारत में 49,132 मेगावॉट पवन ऊर्जा का उत्पादन करने की क्षमता है।

लाभ

  • यह पर्यावरण के अनुकूल है ।
  • इसकी स्वतंत्र रूप और बहुतायत से उपलब्ध।

हानि

  • उच्च निवेश की आवश्यकता।
  • हवा की गति जो हर समय एक समान नहीं होने से बिजली उत्पादन की क्षमता प्रभावित होती है।

जैव भार और जैव ईंधन

जैव भार क्या है?

पौधों प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम सौर ऊर्जा का उपयोग बायोमास उत्पादन के लिए करते हैं। इस बायोमास का उत्पादन ऊर्जा स्रोतों के विभिन्न रूपों के चक्रों से होकर गुजरता है। एक अनुमान के अनुसार भारत में बायोमास की वर्तमान उपलब्धता 150 मिलियन मीट्रिक टन है। अधिशेष बायोमास की उपलब्धता के साथ, यह उपलब्धता प्रति वर्ष लगभग 500 लाख मीट्रिक टन होने का अनुमान है।

बायोमास के उत्पादन के लिए उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी

बायोमास सक्षम प्रौद्योगिकियों के कुशल उपयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित हो रहा है। इससे ईंधन के उपयोग की दक्षता में वृद्धि हुई है। जैव ईंधन ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जिसका देश के कुल ईंधन उपयोग में एक-तिहाई का योगदान है और ग्रामीण परिवारों में इसकी खपत लगभग 90 प्रतिशत है। जैव ईंधन का व्यापक उपयोग खाना बनाने और उष्णता प्राप्त करने में किया जाता है। उपयोग किये जाने वाले जैव ईंधन में शामिल है- कृषि अवशेष, लकड़ी, कोयला और सूखे गोबर।

  • स्टोव की बेहतर डिजाइन के उपयोग से कुशल चूल्हे की दक्षता दोगुना हो जाती है।

लाभ

  • स्थानीय रूप से उपलब्ध और कुछ हद तक बहुत ज़्यादा।
  • जीवाश्म ईंधन की तुलना में यह एक स्वच्छ ईंधन है। एक प्रकार से जैव ईंधन, कार्बन डायऑक्साइड का अवशोषण कर हमारे परिवेश को भी स्वच्छ रखता है।

हानि

  • ईंधन को एकत्रित करने में कड़ी मेहनत।
  • खाना बनाते समय और घर में रोशनदानी (वेंटीलेशन) नहीं होने के कारण गोबर से बनी ईंधन वातावरण को प्रदूषित करती है जिससे स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होता।
  • जैव ईंधन के लगातार और पर्याप्त रूप से उपयोग न करने के कारण वनस्पति का नुकसान होता है जिसके चलते पर्यावरण के स्तर में गिरावट आती है।

जैव ईंधन के उत्पादक प्रयोग हेतु प्रौद्योगिकी

जैव ईंधन के प्रभावी उपयोग को सुरक्षित करती प्रौद्योगिकियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहीं हैं।

ईंधन उपयोग की क्षमता निम्नलिखित कारणों से बढ़ाई जा सकती है –

  • विकसित डिज़ाइन के स्टोवों का उपयोग, जो क्षमता को दोगुणा करता है जैसे धुँआ रहित ऊर्जा चूल्हा।
  • जैव ईंधन को सम्पीड़ित/सिकोड़कर (कम्प्रेस) ब्रिकेट के रूप में बनाये रखना ताकि वह कम स्थान ले सके और अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
  • जैव वस्तुओं को एनारोबिक डायजेशन के माध्यम से बायोगैस में रूपांतरित करना जो न केवल ईंधन की आवश्यक्ताओं को पूरा करता है बल्कि खेतों को घुलनशील खाद भी उपलब्ध कराता है।
  • नियंत्रित वायु आपूर्ति के अंतर्गत जैव ईंधन के आंशिक दहन के माध्यम से उसे उत्पादक गैस में रूपांतरित करना।

नवीकरणीय ऊर्जा बनाम नवीकरणीय ऊर्जा

अक्षय ऊर्जा, जैसे कि सूर्य की रोशनी, हवा, बारिश, ज्वार और भू-तापीय गर्मी से अक्षय ऊर्जा उत्पन्न होती है- जो नवीकरणीय (स्वाभाविक रूप से भर दी जाती हैं) हैं। ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रक्रियाओं की तुलना करते समय, नवीकरणीय ऊर्जा और जीवाश्म ईंधन के बीच कई मौलिक अंतर रहते हैं।

तेल, कोयला, या प्राकृतिक गैस ईंधन उत्पादन की प्रक्रिया एक कठिन और मांग प्रक्रिया है जिसके लिए बहुत से जटिल उपकरण, भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ, वैकल्पिक ऊर्जा को मूल उपकरण और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ व्यापक रूप से उत्पादित किया जा सकता है।

लकड़ी, सबसे नवीकरणीय और उपलब्ध वैकल्पिक ईंधन, जलाए जाने पर उसी मात्रा में कार्बन उत्सर्जित करता है, अगर यह स्वाभाविक रूप से खराब हो जाता है। परमाणु ऊर्जा जीवाश्म ईंधन का एक विकल्प है जो जीवाश्म ईंधन की तरह गैर नवीकरणीय है, परमाणु एक सीमित संसाधन हैं।

भारत में ऊर्जा के इस्तेमाल की वर्तमान स्थिति

  • भारत  की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। यदि हमें  वर्तमान विकास की गति को बरकरार रखना है तो ग्रामीण ऊर्जा की उपलब्धता को सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है।
  • अब तक हमारे देश के 21 प्रतिशत गाँवों तथा 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तक बिजली नहीं पहुँच पाई है।
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवार रसोई के ईंधन के लिए लकड़ी पर, 10 प्रतिशत गोबर की उपालियों पर और लगभग 5 प्रतिशत रसोई गैस पर निर्भर हैं। जबकि इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए 22 प्रतिशत परिवार लकड़ी पर, अन्य 22 प्रतिशत केरोसिन पर तथा लगभग 44 प्रतिशत परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं।
  • घर में प्रकाश के लिए 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवार केरोसिन पर तथा अन्य 48 प्रतिशत बिजली पर निर्भर हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए 89 प्रतिशत परिवार बिजली पर तथा अन्य 10 प्रतिशत परिवार केरोसिन पर निर्भर हैं।
  • ग्रामीण महिलाएँ अपने उत्पादक समय में से लगभग चार घंटे का समय रसोई के लिए लकड़ी चुनने और खाना बनाने में व्यतीत करती हैं लेकिन उनके इस श्रम के आर्थिक मूल्य को मान्यता नहीं दी जाती।
  • देश के विकास के लिए ऊर्जा की उपलब्धता एक आवश्यक पूर्व शर्त्त है। खाना पकाने, पानी की सफाई, कृषि, शिक्षा, परिवहन, रोज़गार सृजन एवं पर्यावरण को बचाये रखने जैसे दैनिक गतिविधियों में ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग होने वाले लगभग 80 प्रतिशत ऊर्जा बायोमास से उत्पन्न होता है। इससे गाँव में पहले से बिगड़ रही वनस्पति की स्थिति पर और दबाव बढ़ता जा रहा है।
  • गैर उन्नत चूल्हा, लकड़ी इकट्ठा करने वाली महिलाएँ एवं बच्चों की कठिनाई को और अधिक बढ़ा देती है। सबसे अधिक, खाना पकाते समय इन घरेलू चूल्हों से निकलने वाला धुंआँ महिलाओं और बच्चों के श्वसन तंत्र को काफी हद तक प्रभावित करता है।

उपसंहार

  • बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन आज पृथ्वी के लिये सबसे बड़ा संकट बन गया है। इसे लेकर पूरी दुनिया में हाय तोबा मची हुई है।
  • इसको लेकर कई तरह की भविष्यवाणियाँ भी की जा चुकी हैं, दुनिया अब नष्ट हो जाएगी, पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी, सृष्टि का विनाश हो जाएगा।
  • ज्यादातर ऐसा शोर पश्चिम देशों से उठता रहा है, जिन्होंने अपने विकास के लिये न जाने प्रकृति के विरुद्ध कितने ही कदम उठाए हैं और लगातार उठ ही रहे हैं।
  • आज भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने वाले देशों में 70 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी देशों का ही है जो विकास की अंधी दौड़ का परिणाम है। मगर वे इस पर जरा भी कटौती नहीं करना चाहते।
  • हालाँकि प्रत्येक साल इस गंभीर समस्या को लेकर विश्व स्तर पर शिखर सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही रहते हैं। जबकि दुनिया को जलवायु परिवर्तन के भीषण असर से बचाने के लिये ऐसा करना नितांत आवश्यक है।
  • असल में जलवायु परिवर्तन एक ऐसा मुद्दा है, जो पूरी दुनिया के लिये चिंता की बात है और इसे बिना आपसी सहमति और ईमानदार प्रयास के हल नहीं किया जा सकता है।
  • भूमंडलीकरण के कारण आज पूरा विश्व एक विश्वग्राम में तब्दील हो चुका है। वक्त कुछ करने का है न कि सोचने का।
  • जाहिर सी बात है कि इसके लिये कुछ देश एवं कुछ संगठन तब तक ज्यादा कुछ नहीं कर पाएँगे जब तक दुनिया के धनी देश प्रयास न करें।

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