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व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika PDF in Hindi

व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika Hindi PDF Download

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व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika PDF Details
व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika
PDF Name व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika PDF
No. of Pages 696
PDF Size 12.66 MB
Language Hindi
CategoryEnglish
Source pdffile.co.in
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व्रत उद्यापन चंद्रिका | Vrat Udyapan Chandrika Hindi

नमस्कार मित्रों, इस लेख के माध्यम से हम आप सभी को व्रत उद्यापन चंद्रिका / Vrat Udyapan Chandrika PDF प्रदान करने जा रहे हैं।  अगर आप इसे पहले से ही इंटरनेट पर खोज रहे हैं और ढूँढ पाने में असमर्थ हैं तो चिंता मत कीजिये यह पोस्ट आपके लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। जैसा कि आप सभी को पता ही होगा कि हिन्दू सनातन धर्म में अनेकों प्रकार के व्रत व उपवासों का पालन किया जाता है।

हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में किसी भी प्रकार के व्रत व उपवास के लिए उससे संबन्धित व्रत विधि व कथा का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। क्योंकि किसी भी प्रकार के व्रत व उपवास का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उसको विधि – विधान से करना आवश्यक है। तो मित्रों अगर आप भी किसी भी प्रकार के व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको व्रत को विधि – पूर्वक पूर्ण करने के पश्चात उद्यापन अवश्य करना चाहिए ऐसा करने से व्यक्ति को उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।

व्रत उद्यापन चंद्रिका PDF / Vrat Udyapan Chandrika PDF

॥ श्रीगणेद्याथ नमः ॥

प्रास्तामिकं किचित्‌ ॥

महादमावाः पडितमवराः

नगभियन्तुर्मगयत्‌ः कपया सग्रदमखा नवचंटीरतचण्ड्वादे-
भ्रयोगसदिवेथं “ व्रवोधापनचद्धिका ” चन्दरिकेव भवत्स्मीपि मरक
रैङरत्य॒परणानद्मनुभदामि ! मारदवषीयास्तु धरपपाणाः खकरया-
णाय चतादिपु भ्रदधावन्तस्तान्याचरत्ति तेन च स्वान्‌ ्रयोवतो धन्यां
मन्यन्ते ॥ एतदर्थं चैतद्विपयकेु वहुषु अन्ये सत्स्वपि
केपांचिसेरणया कर्मकारयितर्णा वकि्रोषेणीपयोगी यथा भवेत्तादशों
बतादिबिषयकर ग्रन्थः संयोजनीय इत्ययं ग्रंथो ययागक्ते संयोजितः}
अब्र गणपतिपूजने पुराणोक्तमन्त्रा यथा सयैदेवोषयोगिनो भवेयुस्तथा
यवचित्ववचिच्छब्दैः परिविर्तिताः ।) कचिद्‌ व्याकरणटूपिताः प्रयोगाः
संशयिताः । चह्यादिदेवतानां फेचिन्मन्त्रा एकवेचनद्ुवचनोदेशेना
सुचितास्तेऽपि ववचित्‌ परिवततिताः} यवशिष्टाथ सूनना विस्च्य पट्ष-
श्वासत्स॑रूपया पूरिता! । अपिदेवतप्रत्यधिदेवतादीनां मन्त्रा अपि
विशेषेण स्थापिताः ॥ दत्तत्रियराजोपचारपूजनादिविपयौऽपि प्रचलित-
कारकर्मविशेपतया संयोजितः । भायः भचटित्तापचकितताः सर्वेऽपि
चतोयापनप्रयोगा; कर्मफारपितणां यथा सुगपरदयोपयोमिनः स्युस्तथा
संसोनिताः विशेषेण च नव्चंडीशतचण्ड्यादिप्रयोगोऽपि विक्ेपतयां
याहिङानां कृते भयोजितः । अत्र च्मादिसर्वतोभद्रमण्डरदेषता-
योगिनी-बास्ुदेवता-सेत्रपारमंदर्देवतानामवं पात्रासादनस्य च

{४]

योटकान्यपि दत्तानि 1 पाप्रास्ादनपरयोगस्तु भिन्न भिन्न एव दत्तो
यथा सामान्यतयाप्युपयोभी भवेत्‌ | विशेपङ्थनपनुवितापति यातिकाः
स्वयमेवास्य ग्रन्थस्य योग्यतामलुमेयुयेत्साएस्यं गरन्यस्य ॥
अव्र पप शरीरस्यास्ास्थ्येन संोधनदिपये दृष्ोषेण-
सीसङकषरसेयोजरानां भमदेन-यन्योपरि विश्पेणादुस्वारमातादीमां
चटनेन च यथपि बहाने स्वरनानि संजातानि पितु तेषां शरदधिपत्रं
महदपि दत्तं तदि त त्र स्याने पू संयोध्यैव भयोगः कारयितन्यः 1
श्धिपनरे दत्तेऽपि कचिद्वशिष्ं स्वङनं दृ्िपर्ं समागच्छेथे्दुपि
स्ययमेव संशोधनीयं चावश्यफ़ सूचनीय विद्रद्धिरित्या्ासे ॥
अत्र पुनः परमानंदप्रयोजनं त्वेतदेव यन्या मम ज्योतिपविप-
यके शुजैरमापालुबाद-विवरणसदित~उडदायमदीष-रघुपाराखरी-
नान्न सुद्रापापित्या पकटीकृते ग्रन्थ प्रस्तावनायां यर्छिलितं तदरयुसा-
रेणायं ग्रन्थो मम स्वरगेबातिभ्यो वियानिपिभ्यः सुमातिद्धयीरतिभ्यः
पश्च गुख्वर्येभ्य एव सादरं समपिंतवानसि 1 एतत्तु जगदीश्वरस्य कृषा
सद्धुरूणां च परमाषिप इति म्रा जीवनधन्यत्तां मन्ये । एतेषं
खपुजीवनदत्तान्ता अग्रतो दत्ता; ॥

अन्तत यदि य्षिका इं सनीर्ीरन्यायेनेमं ग्रन्यमवछोक्य
अन्योषयोगं इुर्युघेन्मम भयत्नः सफठों भवेदित्युक्त्या मगवन्तं
मायेय यद्याक्गिकानां तेऽयं ग्रन्थो परमोपयोगी भूयादिति ॥
सवव २०९ यार्गशीर्ष | भगवतः सद्ुरूणां च कृपाभिलापी
ण ६१ गीवाजयती १ पुण्डयोपाहु-धीरजरामास्मन-तुरजादांकरः ॥
५ न्नव

{५1

स्व. पञ्चगुरव्याणां टघुजीवनट़त्तान्ताः
ख, बेदमूतिं श्री, जमीयतराम शिरजारशंकर शु
भस्त पेतिह्यसिक स्थद्ड छे. ऋषियुगथी एनो इतिहास तेजस्वी
ॐ, घेदवि्यानी अपू खकीर्ति भ्राचीन काटटथी एने भप्त थी छे.
(्/ भ्रातःस्मस्णीय भगवती नर्मदामावानी
अनन्य छपाी ए सुरक्षित छे,
आ शहेस्मां वेदविद्याचरागी भी.
भिरिजिाक्चकरभाईने सयां संवत्‌ १९१६ ना
भाद्रपद क्ट द्ादशीने यस्वारे जमीयत-
साममाईनौ जन्म थयो हतो. जेमणे पोल
समभ्र जीवन गुख्सेवा,. जनसेवा अने
कक्ैव्यपालनमां व्यतीत कदु हतै. मरूचनी
ख्याति पमत्रे वरेखी. क्लानमर्तेडसमा
~ पएमणे शानोपासना पाक जीवननां मौघां
पव. चदुमूरतिजमीयतयम गिरिजा. वपे गाच्यां छे. मात्र छ मालनी वये पित्ता
शङ्कर द्क्ड ( मख्च-गुलरत ) स्वगेवासी ययेखा. ग॑सेध मति पुत्रवा-
रसरयने छने सुखदुःख वेढीने पण वाव्छकमा कोड पूरा करेला.
भी. जमीयतसाममारता जीवन उपर भगवती सरस्वती मातानां
एपासित उतसछा. चकनिषठाणी प्पमणे शु्सेवा करेली. सादाद अने
संसार तेमना प्रिय विषयो दता. नवचोकी उपर सरितातटे आवटी
एक मदुरीमां ए र्देता- दक्षिणी गुल्पासि एओप थो वेदाध्ययनं करेदु.
शुरुदेवना परलोक गमन पदो पचम जिर्कानः चीमीड प्राङण शी.
माणक्केश्वर अस्ति जेओ चेदविद्याना रन्ध्रति् विद्यान्‌ दता तेमनी
पासे प्राचीन खडि धमा कवा कती वेद्‌, कमैकांड अतर धमेशाल्ननो पणे
अभ्यास कयं हसो.
श्रीयत जमीयतसयममाई केयमी, सदग्चारी अनि स्वाश्चयी हता,
चाट्यकाच्डथी ज शारीर ्रतिमासेफ् अने गौरवणी हते. यमलै केठ-

[६]

माधुय मपरतिम हदं, पिनय, समा भने परयित्रतानी निवेणो पएमना
जीवनमां चद्याज कर्ती.
भरूचनी “नर्मदासेस्रुतपाटशाव्टा्ना पोषे भाजीवन गुदे र्हा
इता. अविधांत परिधम फ अने पमणे मदहागुजखतमां चैदचिदाना
संकटो चिधार्थीओो तैयार र्या ठे आजे भरूवनी जीयती र्देली वेद-
विधा पमना ज परिधरमय मीडे फन ठे. मेँ पण संहित्तानो थोढो
अभ्यास पमनी एपाथी पमन पावे ज करो. मकूचनी ओोदिव्य
श्वातिना पः पुरोहित हता. प भनातदात्र, मितभाषी अने मघुमापी
दोवाधी सर्वेने अत्यैत प्रिय यरं पडेला. सौ कोई पमने ^ गु्जी » कटी
संबोधता, प्रमाणिकता अने सता तेमना जीचननी चावीकूप एतां.
तेमनं आघ्वुय जीवन आदरशरूप, अलुकरणीय अने लादरणीय दतं,
पाटदयाढ्छाना परिश्रमने लद्ैने ब्रद्धावस्वामां इन्द्ियोनी शमित घटी
पण आत्मानी शक्ति अौकिफ हती,
भरूचना भा वेदविद्याना भाग्यविधाता शाख जने षर्म॑कफांडना
महान्‌ आचाय सरस्यतिना छादी छेवटे संवत्‌ १९९९१ ना कार्तिक
शष्ठ चरीजने शुच्रवररे धभातना ११. वागे भा नश्वर संघार छोडीने
पोतानी पाखव्ड बे खपुधो वेदमूतिं मणिभाईे अने भाईेभी पार्यतीशंकरः
अने एक सपुधरीने मूकी पचोतेर यदेनी वये भरूच सहित गुजरातने
शयोकस्ागरमां द्रषावी पंचत्व पाम्या
तेभोना खत्थुदिने पाटडाद्धाना खव्णेमदोत्सवनो समारंभ हतौ,
परल पारद्यच्छानो ए समारंभ स॑पूर्णरीते उजवाया वाद्‌ तेनी संपूर्णतानो
शुभसदेश्ण सांमज्या पठीज तेमना आत्माचं विजन ययु दतु. मा दतो
चादद्ाव्या भत्येनो सद्‌गतनो पकनिषठ मेम. मरूतमा स्वभैस्थना मानां
भसे स्वरस्य भल्ये पूज्यमाव्‌ दुर्ावनार अनेक सदूश्दस्थोप
ऋ्वशस्थना आच्मानी दाति ईच्छी तेमने अजि समर्पित करी दती.
सद्गते तेखचिन पाठदाद्टामा अनावरण करी राखलवामां मायुं
छे. कोटिवेदम टो ए दिन्यात्माने 1

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